Thursday, April 28, 2011

कुछ रह गया है...

वो पुरानी सकरी गली खो गयी है
वो छोटा छाँव वाला छप्पर ढह गया है
वो कंचे पुरानी फटी जेब से गिर के बिखर गए हैं
जब तलशता हूँ वो यादों का झोला
तो लगता है की पीछे कुछ रह गया है

न जाने कहा छुप गए हैं वो बचपन के दोस्त
पता नहीं किस याद संग वो लकड़ी का बैट बह गया है
अरे यार वो बर्फ के गोले इमली चूरन भी नहीं मिल रहे
खंगाल डाले सारे पुराने बक्से जो संभाल रक्खे थे तब से
थक गया ढूंढ के आजिम कह गया है
यकीं है मुझको की पक्का पीछे कुछ रह गया है

कॉपीराइट रमन शुक्ला :)

Wednesday, April 27, 2011

तुम

तुम रह जाते तो सुकून रह जाता
थाम के हाथ तुम्हारा हर गम सह जाता ..
दरिया या समंदर कही भी कश्ती चला देता ..
मरू बंजर में भी फूल खिला देता ..
कुछ और देर रहते तो कुछ कह सुन पाता ..
... कुछ और दिन जीने का जूनून रह जाता ...
तुम रह जाते तो सुकून रह जाता...
कॉपीराइट रमन शुक्ला :)


Thursday, April 14, 2011

शेर

आशिकी किसी परदे की गुलाम नहीं ,
हम करते चुप के कभी सलाम नहीं ,
छुपाना कुछ अपनी फितरत नहीं ,
वो इश्क क्या जिसका हो चर्चा सरे आम नहीं

Friday, January 21, 2011

खुदगर्ज़

क़त्ल कर के खंजर दिखा के वो बोले ..
मोहब्बत तो थी मगर ,
हमने भी निकाले दिल के अरमान हौले हौले ....

Thursday, January 13, 2011

उम्म्म्म

तेरे घर में बस तू ही तू है ,
बता की मै आऊं कैसे
झांक के देखा दिल में तेरे
जगह कम है समाऊँ कैसे

तू जो देखता उधर है
पीठ पीछे तुझे बहलाऊँ कैसे
रूठ के तू दूर छूट गया है
करके जतन तुझे मनाऊँ कैसे

Monday, December 27, 2010

क्यूँ सोचता हूँ मै

कभी कुछ सोच के है होता
कभी कुछ यूँ ही है हो जाता
जो पहले गिरने की भनक भी होती
तो क्यूँ मै रेत के महल बनाता

निकला था सबेरे का देखने सूरज
होता बेहतर अगर मै
शाम ढलने से पहले पहुच जाता

Thursday, December 9, 2010

फॉर AP

जिसको आदत थी मेरे कंधे की
कैसे उसने दूसरे के कंधे पे संभाला सर होगा
मेरे दिल सोच के कश्मशाता है
नया आया जो होगा उनके दिल में
देखा उसने वहां मेरा पुराना घर होगा