Thursday, July 29, 2010

RAIN

Drops of water coming from Sky

Wet me you and whoever is dry,

few call it rain

few say look God again cry

though this makes city traffic slow

but it makes my heart beat grow

it might expose many troubles

for me it makes those green leaves glow

whatever they call it god’s cry or rain

but for me it’s a joy train,

coming from sky stopping on earth

one reason for millions of smile’s birth

Monday, July 26, 2010

तुम्हारे लिए

कभी धीमे से कोई कुछ फरमा जाये
कान के पीछे कोई हवा सा आ जाये
सीने से होते हुई वो ऊँगली जो गुजरे बालों से
कभी ठिठक जाये गर्दन से होते हुए गालों पे
तुम्हारे लिए मुझको पागल बनाने को इतना ही काफी है
ऑरकुट फेसबुक ट्विट्टर पे प्रोफाइल फोटो
कभी उसके दिए हुए गुलाब दो ठो
रातों को फ़ोन पे यूँ ही समेट देना
ख्वाबों की लम्बी उड़ान को
एक मुस्कान में लपेट देना
तुम्हारे लिए मुझको पागल बनाने को इतना ही काफी है

Tuesday, July 20, 2010

क्या वाकई समय कम है मेरे पास

अहमदाबाद छोड़े हुए २ महीने ७ दिन हो गए हैं। देखा जाये तो इतने समय में बहुत कुछ बदल गया है , काफी कुछ आगे आने को पड़ा है और शायद उससे कही ज्यादा पीछे छूट गया है। वंहा एक के साथ रहता था था और एक मुझसे नफरत करता था और यंहा एक के साथ रहता हूँ और एक से नफरत करता हूँ । खैर सबसे जरुरी बात की इतने दिन में कुछ लिखने का मौका भी नहीं मिला तो पेश हैं चार पंक्तियाँ , प्रस्तुतकर्ता पुराना संत :

कही कुछ भूल जाता हूँ
तो कही कुछ याद रह जाता है
जिससे चाहूँ रहना दूर
वही रह रह के पास आता है
छोड़ आया जिसे घूँट समझ कर
बन के समंदर मुझ प्यासे को तरसाता है
बिना पतवार के रेत पे ये कश्ती
तलाशती है अपने माझी को
पर सूखे किनारों पे भी कहा कोई कभी आता है

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...