kabhi shabdon ko adal kar badal kar
kabhi bebak kabhi sambhal kar
hum yahi kahte rahe hain
tum tak hi pahuchenge ,
aaye seedhe ya aaye tum tak fisal kar
तकियों मे कब से नींद छोड़ आए हैं
और छोड़ आयें हैं चादरों मे सलवटें
जब से तुम रात मे जागने लगे हो
छोड़ आए हैं हम वो नींद की करवटें
मेघ आए पर ना आई बारिश
कही तुम परेशान हो क्या
घुलती शाम मे भी ना आए ठंडे झोंके
कही तुम अधूरे अरमान हो क्या
नींद आई पर तुम ना आए ख्वाबों मे
मेरी तरह तुम भी बिखरे समान हो क्या
हमारे पास तो तुम्हारे लिखे खत भी नही हैं
ना ही कोई सौगात और तॉहफ़ों की गिनती है
फिर भी पता नही ऐसा क्या आ गया है मेरे पास तुम्हारे पास से
की बस लगता है कुछ रह गया है मेरा तुम्हारे पास
चन्द लम्हे हैं बिताए हुए बस तुम्हारे साथ
कुछ धूप मे और कुछ उस चाँद के नीचे घिरी रातों मे
इतना कितना मोल होता है लम्हों का की
लगता है सब कुछ बेच आया हूँ उन कुछ लम्हों को खरीदने मे