Wednesday, April 18, 2018

kuch panktiyan wakt ke pannon se

kabhi shabdon ko adal kar badal kar
kabhi bebak kabhi sambhal kar
hum yahi kahte rahe hain 
tum tak hi pahuchenge , 
aaye seedhe ya aaye tum tak fisal kar

तकियों मे कब से नींद छोड़ आए हैं
और छोड़ आयें हैं चादरों मे सलवटें
जब से तुम रात मे जागने लगे हो

छोड़ आए हैं हम वो नींद की करवटें

मेघ  आए पर  ना  आई बारिश
कही  तुम परेशान  हो  क्या 
घुलती  शाम मे  भी  ना आए  ठंडे  झोंके 
कही  तुम अधूरे  अरमान  हो क्या  
नींद  आई पर  तुम  ना आए  ख्वाबों मे  
मेरी  तरह   तुम  भी  बिखरे समान  हो  क्या

हमारे  पास तो  तुम्हारे  लिखे  खत  भी  नही  हैं
ना ही  कोई  सौगात  और  तॉहफ़ों  की  गिनती  है  
फिर भी  पता  नही  ऐसा  क्या    गया  है मेरे पास  तुम्हारे  पास  से  
की बस  लगता  है  कुछ  रह  गया  है  मेरा  तुम्हारे  पास  

चन्द लम्हे हैं  बिताए  हुए  बस  तुम्हारे  साथ  
कुछ धूप  मे  और  कुछ  उस  चाँद  के  नीचे  घिरी  रातों  मे  
इतना कितना मोल  होता  है  लम्हों  का  की  
लगता है  सब  कुछ  बेच  आया  हूँ  उन  कुछ  लम्हों  को  खरीदने  मे


Monday, April 16, 2018

She

She has given it
and she has taken it away
by her charm, by her calm
she is the one who invited
and yet she is the
one who forgot By the way

she being there
I was dreaming and happy
her guard and her candour
kept me around and sway
she was polite and left me alive
though she could have taken everything away

Friday, April 13, 2018

माँ और बेटी

किल्कारी भर के कल ही तो तुम आई थी,
इतनी भी पुरानी बात नही जब तुम मुझमे समाई थी
इन यादों के तुम भूल भी जाओ
ना भूलना नित नयी यादें बनाना
बड़े होके बस थोड़ी मुझ सी हो जाना थोड़ी खुद सी हो जाना

रात सबेरे का ज्ञान नही, बस मर्ज़ी से जग जाती हो
हाँ तुम ही हो मुझसे ये शायद समझाती हो
वक़्त बेवक़्त का हिसाब नही बस देख मुझे इठलाती हो
लगा के उर से जब थपकी दूं तो शांत भाव से सो जाना
बड़े होके  बस थोड़ी मुझ सी हो जाना थोड़ी खुद सी हो जाना

मानव मानव मे भेद नही बस सबकी अंक मे छुप जाती हो
स्थिर अस्थिर कर देती हो
जब बस तुतला के  माँ बोल बुलाती हो
अंक और अक्षर लगते एक जैसे बस रंगों का भेद है जाना
बड़े होके  बस थोड़ी मुझ सी हो जाना थोड़ी खुद सी हो जाना

Wednesday, April 11, 2018

इश्क़ के हज़ारों रंग

वो बता के चल दिए की इश्क़ के हज़ारों रंग
हमारा रंग कौन सा बस ये नही हमे पता
 पर शायद स्याह सा होगा
और गहरा भी होगा
गतिमान नही होगा
उदास  सा और ठहरा सा होगा
ऐसा होगा जो बस किसी का ना सुनता हो
शायद कुछ बहरा सा होगा
हुस्न के हज़ारों रंग
मेरा शायद सब रंगों पे कोहरा सा होगा 

Saturday, April 7, 2018

क्या हो तुम?

क्या हो तुम
जो करीब हो तो छोटी हो जाती हैं रातें
भाग जाता है वक़्त पैमानों से भी आगे
कुछ याद नही रहता दुख भरा
ना ही  चिंता रहती है कल की
दर्द भी याद  नही रहते
दवा की ज़रूरत नही रहती
जादूगर हो कोई क्या?
क्या हो तुम?


वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...