Tuesday, March 31, 2015

Wasl

जब जब दरवाजे पे होता हूँ जाने के लिए
 तेरी याद मे एक हिचकी आ जाती है मनाने के लिए
रूठता नही हूँ बस कोशिश होती है तड़प दोनो की तौलने की
 वैसे भी सब छोड़ के आया हूँ तुझे पाने के लिए
ऐसा नही की मै समझता नही तेरी हक़ीकत
की तुझे भी चाहिए कुछ वक़्त इस दिल को साझाने के लिए
अफ़सोस नही मै भी जानता हूँ पगली
एक ज़िंदगी नाकाफ़ी है एक दूजे को पाने के लिए

Monday, March 30, 2015

Puraane Khat

पुराने खतों की स्याही मिट गयी
पर शायद लिखावट की गहराई अभी बाकी है
कभी इन पन्नों के दोनो तरफ हुआ करते थे हम दोनो
 पर शयब अब मेरे हिस्से की तन्हाई अभी बाकी है
सूख गये गुलाब के वो फूल इन खातों मे दबकर कही
 पर आज भी तेरे आँसुओं की परछाई इन खतों मे कही बाकी है

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...