Monday, December 27, 2010

क्यूँ सोचता हूँ मै

कभी कुछ सोच के है होता
कभी कुछ यूँ ही है हो जाता
जो पहले गिरने की भनक भी होती
तो क्यूँ मै रेत के महल बनाता

निकला था सबेरे का देखने सूरज
होता बेहतर अगर मै
शाम ढलने से पहले पहुच जाता

Thursday, December 9, 2010

फॉर AP

जिसको आदत थी मेरे कंधे की
कैसे उसने दूसरे के कंधे पे संभाला सर होगा
मेरे दिल सोच के कश्मशाता है
नया आया जो होगा उनके दिल में
देखा उसने वहां मेरा पुराना घर होगा

Sunday, September 12, 2010

दो लाइने

तनहा ठहरा हूँ सहरा में वरना अभी डूब जाने को गम बहुत हैं
मिला था जो दिल वो तोड़ आया हूँ , वरना दिल चुराने को सनम बहुत हैं

वैसे तो लरजते लफ़्ज़ों से शायरी कर रहा होता अभी तो बताने को गम बहुत हैं
मुफलिसी में उनको याद करता हूँ वरना करने को इस दुनिया में करम बहुत हैं

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What I Love

What I love is
not profession but my obsession
might not bitches but the beaches
perhaps not possession but the passion
and I love is that
old wealthy tradition
I love to show
a grin to enemies and hugs to friends
applauds to smart ass and
middle finger to sloppy brains,
I love to read
I love to drive
in a war field I love to survive,
conquer the quest,
Defeating the best
is exactly what I love
is to finish the job before I could rest.

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Sunday, September 5, 2010

रुसवा

बहुत कुछ तुम समझते हो
या समझते कुछ नहीं तुम हो
यहाँ पर अश्क बहते है
अगर कही तुम जो गुमसुम हो
अगर तुम्हारा दिल शीशे सा है बिखरा
तो हमरा भी रेत का महल टूटा है
फेर कर मुह कभी भी तुम चले जाओ
पर मत बोलो की वो सनम था जो झूठा है

की शायद आज इन बातों पे यकीं तुमको न हो
पर कभी तो सच खुल कर आएगा
दोनों ही शायद तब अफ़सोस से रोयेंगे
पर सच किसी से कहा न जायेगा .......

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Sunday, August 15, 2010

आज़ादी

देखो हर तरफ लहरा रहा
तिरंगा फिर से सर उठा रहा
हर साल की तरह फिर एक
ये देश आज़ादी मना रहा
दिखावे में हम झूल गए हैं
शायद मतलब आज़ादी का भूल गए हैं
कही प्रतिज्ञा वंश और इक्छा
commercially आज़ादी मना रहे
तो कही ५० प्रतिशत भारतीय
ड्राई डे होने का अफ़सोस जता रहे
सन ४७ का एक देश आज
कई देशों में टूटने को तैयार है
कल जो सबका हिन्दुस्तान था
आज ठाकरे का महाराष्ट्र और लालू का बिहार है
छुप गया है मतलब आज़ादी का एक ओट में
सब मगन है आज मधुशाला वोते और नोट में
खेल लो आज और एक दांव और
आज़ादी को दिल से मना के देखो
एक बार तिरंगे को उन शहीदों की तरह फहरा के देखो

Friday, August 13, 2010

शायद

पीने से मिलती फुरसत तो शायद
मै भी मधुशाला लिख पाता
पारो नहीं चंद्रमुखी ही मिल जाती तो शायद
मै भी देवदास बन जाता
बच्चन नहीं वचन चाहिए थे
हाल - ए - मधुशाला लिखने को
पारो ही नहीं एक दोस्त चुन्नी सा
भी चाहिए था देवदास सा दिखने को
हाला से ये हाल हुआ की डगमग
डगमग अब ये पग पड़ते हैं
हाल के हाल से बचता तो दो
चार कदम सीधे चल पाता
पीने से मिलती फुरसत तो शायद
मै भी मधुशाला लिख पाता

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Thursday, July 29, 2010

RAIN

Drops of water coming from Sky

Wet me you and whoever is dry,

few call it rain

few say look God again cry

though this makes city traffic slow

but it makes my heart beat grow

it might expose many troubles

for me it makes those green leaves glow

whatever they call it god’s cry or rain

but for me it’s a joy train,

coming from sky stopping on earth

one reason for millions of smile’s birth

Monday, July 26, 2010

तुम्हारे लिए

कभी धीमे से कोई कुछ फरमा जाये
कान के पीछे कोई हवा सा आ जाये
सीने से होते हुई वो ऊँगली जो गुजरे बालों से
कभी ठिठक जाये गर्दन से होते हुए गालों पे
तुम्हारे लिए मुझको पागल बनाने को इतना ही काफी है
ऑरकुट फेसबुक ट्विट्टर पे प्रोफाइल फोटो
कभी उसके दिए हुए गुलाब दो ठो
रातों को फ़ोन पे यूँ ही समेट देना
ख्वाबों की लम्बी उड़ान को
एक मुस्कान में लपेट देना
तुम्हारे लिए मुझको पागल बनाने को इतना ही काफी है

Tuesday, July 20, 2010

क्या वाकई समय कम है मेरे पास

अहमदाबाद छोड़े हुए २ महीने ७ दिन हो गए हैं। देखा जाये तो इतने समय में बहुत कुछ बदल गया है , काफी कुछ आगे आने को पड़ा है और शायद उससे कही ज्यादा पीछे छूट गया है। वंहा एक के साथ रहता था था और एक मुझसे नफरत करता था और यंहा एक के साथ रहता हूँ और एक से नफरत करता हूँ । खैर सबसे जरुरी बात की इतने दिन में कुछ लिखने का मौका भी नहीं मिला तो पेश हैं चार पंक्तियाँ , प्रस्तुतकर्ता पुराना संत :

कही कुछ भूल जाता हूँ
तो कही कुछ याद रह जाता है
जिससे चाहूँ रहना दूर
वही रह रह के पास आता है
छोड़ आया जिसे घूँट समझ कर
बन के समंदर मुझ प्यासे को तरसाता है
बिना पतवार के रेत पे ये कश्ती
तलाशती है अपने माझी को
पर सूखे किनारों पे भी कहा कोई कभी आता है

Sunday, May 9, 2010

अनामिका - 2

समझना मुश्किल है तुझे
या मुश्किल है तुझे समझाना
दूर रहना तुझसे मुश्किल है
या मुश्किल है तुझको पास बुलाना
ये दिल तेरा राज़ अजीब
तू मुझको जाने पूरा और
मै तुझसे अनजाना

Tuesday, April 20, 2010

अनामिका - १

चला हूँ जिस पथ पे अब तो
पाउँगा मंजिल इसी रास्ते से
भले ही कुछ देर हो जाये

कर्त्तव्य मेरा सिपाही सा
बेहतर है पीछे लौटने से
रण में ही ढेर हो जाये

शाम हो गयी तो क्या
उजालों की तलाश अब
और एक बेर हो जाये

धुंधली दिख रही है तस्वीरें
फिर भी देखूंगा सूरज
ठहरो जरा सबेर हो जाये

** बेर = उत्तर प्रदेश की कड़ी बोली में बेर का तात्पर्य होता है एक बार i.e. once

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Monday, April 19, 2010

हुआ है ये क्या असर

ए हसीं तुझे देख कर
हुआ है ये क्या असर
की जग पड़ी ..दबी हसरतें
चल पड़ा थमा सफ़र

मुस्कुराने लगी
वो खोयी हुई हँसी
गुनगुनाने लगी
जो थी धुन दिल में बसी
लम्हों में जीने लगा
बस तेरा ख्याल कर
हसीं तुझे देख कर
हुआ है ये क्या असर

तारीख थम सी गयी
जब से वो गुजरा है पल
आँख नम हो गयी
दिखा न जो फिर तू कल
लफ्ज़ खामोश हैं
बोलने को बेक़रार हैं नज़र
हसीं तुझे देख कर
हुआ है ये क्या असर

तलाशते हैं तुझे
आते जाते हुए
लौट आये हैं आज
फिर गुनगुनाते हुए
जँहा ये रोशन हैं
बस ये दिल हैं सिफ़र
हसीं तुझे देख कर
हुआ है ये क्या असर

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Tuesday, April 13, 2010

जाओ मै कुछ भी लिखूंगा !!

खाने से संतृप्त पेट
और ऊपर से सिगरेट
दोस्त की शादी में तमाशा
और व्यापर में मुनाफा
....... अच्छा लगता है !!
जन्मदिन पे दोस्तों की लात
तोहफों की बरसात
सुबह आलू का पराठा
और रात में सन्नाटा
......अच्छा लगता है !!

Friday, April 2, 2010

Me!!

I always wanted to be I
and she wanted us to be We
she wanted us so together
and i wanted to fly free
so buddies share some moments
enjoy chattering of birds
& covering of tree
else u will be alone out there like me!!

Saturday, March 20, 2010

जाने नहीं देंगे तुझे..... पप्पू संस्करण

क्या बताएं भैया दिल बड़ा ही उतावला और खुश टाइप से हो रखा है , क्या करें आज दिन ही विशेष है । एक तो समीर भैया का जन्मदिन है आज और दूसरा एक दिन बाद हमर एपरम मित्र पप्पू की सगाई की रश्म अदायगी होनी है । अब ऐसे में इस गीत का पप्पू संसकरण लिखा जाये इससे अच्छा क्या हो सकता है यद्यपि कार्य बहुत है करने को लेकिन इससे महत्वपूर्ण नहीं , खैर प्रस्तुत है ये रचना हमारी तरफ से पप्पू के लिए

जाने नहीं देंगे तुझे ....
जाने तुझे देंगे नहीं
जाने नहीं देंगे तुझे ....
जाने तुझे देंगे नहीं
चाहे तुझको यश श्री बुला ले
हम न उनसे डरने वाले
बहुमत में उनसे बड़े हैं हम
चाहे हम से चुप छुपा के
पप्पू उनको मूवी दिखा ले
हाल के बाहर मिलेंगे हम

जाने नहीं देंगे तुझे ....
जाने तुझे देंगे नहीं
न सिर्फ सात फेरों का सवाल है
शादी सबसे बड़ा जंजाल है
एक लड़की के कहने पे तू आया क्यूँ ????
सुन ले हम सब की नसीहत
छोड़ पीछे ये फजीहत
ये युगल गीत तुने गाया क्यूँ ????
जाने नहीं देंगे तुझे ....
जाने तुझे देंगे नहीं
जाने नहीं देंगे तुझे ....
जाने तुझे देंगे नहीं


कपडे धोने को धोबी लगा था
बनाने खाना कुक गाया था
सिर्फ एक बटन सी न पाया तू
फिर से बिस्तर पे कपडे फैला दे
घर को कूड़ाघर बना दे
करके टंकी खाली बाईक स्टैंड पे लगा दे
रुक जा साले यूँ अकेले जाता है क्यूँ

जाने नहीं देंगे तुझे ....
जाने तुझे देंगे नहीं
जाने नहीं देंगे तुझे ....
जाने तुझे देंगे नहीं
जाने नहीं देंगे तुझे ....
जाने तुझे देंगे नहीं
जाने नहीं देंगे तुझे ....
जाने तुझे देंगे नहीं

Wednesday, March 17, 2010

its time to say good bye

I have gone too far
isn't it right
wasn't my fault
I could see future bright
i wasn't a damn follower
sticking wasn't in my blood
i envy myself
to have so much guts
i love to see ups n downs
its fun to see
changing heads for same crown
this was my chance
n I did my best to try
but now its over
here i am to say
see you folks again
its time to say good bye

Monday, March 15, 2010

क्या कर दूँ

सोचता हूँ कभी जब अकेले खड़े हो कर
जब रौशनी खो गयो गयी होती है
ये दुनिया सो गयी होती है
की क्या कर दूँ मै
अगर पानी रूठ जाये नदी से
आँख न मिला पाए कोई खुद ही से
पंछी अगर बसेरा छोड़ दे
सूरज करना अगर सवेरा छोड़ दे
क्यूँ न बन भागीरथ गंगा बहा दूँ
क्यूँ न भटके को पश्चताप की राह दिखा दूँ
पंछी को पवन से लौटने का सन्देश पंहुचा दूँ
दूर करने को अँधेरा छोटा सा दिया जला दूँ

क्या बदल दूँ दोस्त अगर दोस्त बदल जाये तो
क्या खीच लूँ आँचल लज्जा मूरत कोई शर्माए जो
क्या बदल दूँ रस्ते जो सामने मझधार हो
उजाड़ दूँ मिले अगर कही बहार तो
या करूँ वही जो दोस्त को स्वीकार हो
देख कर मूरत निकल जाऊं अदब से न कोई शर्मशार हो
मझधार को खे कर एक रास्ता नया बना दूँ
मिले कही बहार तो एक और गुलशन सजा दूँ

हर दुसरे विकल्प में वक़्त थोडा लग जायेगा
पर एक खूबसूरत कल बन जरूर जायेगा
इतना ज्ञान तो आज इस छोटे ह्रदय में भर दूँ
क्या कोई और बताएगा की मै और क्या कर दूँ ????


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Sunday, March 14, 2010

क्रन्तिकारी पति या अदद पति- हमारा पप्पू

पप्पू , घबराईये नहीं हमारी अदनी सी मित्रमंडली में पाया जाने वाला विशाल सा प्राणी है , और ये हमारा उसे प्यार से दिए हुए नामों में से उसका एक नाम है । वो जीवन के २७ वसंत पार करने के बाद अब विवाह के जाल में बंधने जा रहा है । वास्तविक नाम रजत गुप्ता है बड़ा ही सुन्दर स्वाभाव का नटखट एवं झोल प्राणी है ये मित्र । अब जीवन में तमाम प्रकार के या यूँ कह ले की सभी प्रकार के अनुभवों को चखने के बाद वो अब इस विवाह रुपी माया के जाल में स्वयं ही फसने जा रहा है , सच तो ये है की जब आदमी के पास कुछ करने को नहीं रह जाता तो वो शादी कर लेता है या जब समाज के लोग किसी को कुछ नहीं करते देखना चाहते हैं तो उसकी शादी करवा देते हैं (ये परिकल्पना सिर्फ भारतीय संस्करण में ही सत्य है )। बेचारा जब से शादी तय हुई है बड़ी ही उहापोह स्थिति में घूमता रहता है , अब क्या करे बेचारा एक सच्चा प्यार पाने की तलाश में ( प्यार बोले तो जिसे लोगो ने कुछ इस तरह परिभाषित किया है "अगर प्यार न हो तो जीवन अकारथ हो जाता है , ये सबसे सुखद अहसास है ", आश्चर्य तो तब होता है जब हमें इस सुखद अहसास के ताज को ढोने वाले सारे अनुभवी रोते बिलखते नजर आते हैं फिर भी इसे सुखद अहसास कर दिया जाता है ) कुछ भी कर सकता है , वैसे तो हमारी मित्रमंडली में सभी के सभी बिना प्रेम की गलियां घूमे हुए जिंदगी के राजमार्ग पे चल पड़े थे और अब दूर दूर तक गली क्या कोई छोटा सा नुक्कड़ तक नजर नहीं आता जहाँ आज २ पहर ठिठक कर प्यार न सही प्यार की २ बातें ही कर सके । तो हाँ हम बात कर रहे थे मिया पप्पू (वैधानिक चेतावनी: ये पप्पू कांट डांस वाला पप्पू नहीं है यद्यपि डांस विधा में ये मात्र क ख ग ही शायद जानते हों ) की , हाँ तो ये तो वो जीव थे जिन्हें राह चलती किसी भी दोपाया मादा से जिसकी उम्र २ अंको में हो से प्यार हो जाता था और प्यार की ये तीव्रता उसके घर से कुल दूरी के समानुपाती एवं उस मादा से रिश्ते की दूरी के व्युत्क्रमानुपाती होती थी। खैर जिंदगी भर ये इस प्यार के समीकरण का स्थिरांक नहीं ढूंढ पाए और कभी इन्हें खुल के प्यार जताने का मौका मिला नहीं वैसे कुछ एक आध सही सात से मौके मिले थे पर "हम बने तुम बने एक दूजे के लिये"गाना परवान चढ़ते-चढ़ते "बहना ने भाई की कलाई पर प्यार बांधा है"का राग अलापने लगे, बेचारे इसमें इनका भी कोई दोष न था अब इसमें क्या कर सकते हैं थे ही हम इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र जहा पे कुछ ४०० लडको में ३० कन्याये थी मतलब सबके हिस्से में १/१० लगभग और उनमे से भी कुछ को हमारे मित्रजनों ने लड़की मानने से ही इंकार कर दिया था , कारण था उनकी १०० मीटर दूर से सुनाई देती अट्टाहास रुपी हँसी या वो कदम से कदम मिलाये जा टाइप फौजियों वाली चाल, खैर इन सबमे भी प्यार का फूल खिलने की कोसिस शुरू हुई तो पता चला सिनिअर्स के हिस्से में हमसे भी एक तिहाई ही आई थी तो अब जब पूरा गुणा भाग लगा के हिसाब लगाया तो सबके हिस्से में १/५० हिस्सा ही लड़की का आया अब इसमें नंगा नहाता क्या और निचोड़ता क्या । ऐसे में कुछ लोगो को प्यार हुआ और कुछ को करवा दिया गया और संतुलित समाज की अवधारणा को जो गहरा धक्का उस दिन लगा था वो आज तक हमारी विदेश नीतियों को प्रभावित कर रहा है। जाने दो ये तो बीती बातें हैं अब इन्हें (पप्पू को ) मौका मिला है तो शादी से पहले इन्हें कुछ दिन मिले हैं प्यार जताने को तो अब इन्हें देख देख कभी कभी हम विचार करते हैं
जब समय मिला तब प्यार नहीं , अब प्यार है तो समय नाही
अब ऑफिस का गोला मारो काम भाड़ में जाहि !!

इस पूरे किस्से में मजेदार बात ये रही की पहले घर वाले बोलते रहो की शादी कर लो शादी कर लो , और जब ये होने वाली भाभी जी से ये मिले की ऐसे गजब फिसले की उठने के लिए जो हाथ पकड़ा अब वो छोड़ने को तैयार ही नहीं थे , अब आप तो जानते हो हमारे उत्तर प्रदेश की शादी लड़के वालों के मीन मंनौअल वाली बातें और जब फ़ाइनल निर्णय में देर लगी तो हमारे पप्पू जी ने बिस्मिल को सन्देश भिजवा दिया की अगर आपकी हाँ है तो हम शादी कर लेंगे जिस दिन कहोगे उस दिन !! और मन ही मन खुश हुए की अब बन जाऊंगा रजा अपनी बात पूरी कर के लेकिन इससे पहले की ये घर में ताल थोक पते घर वालों ने अपनी पारी घोषित कर दो और हाँ बोल दी तो बेचारे हमारे पप्पू ल्रंतिकारी पति बनते बनते रह गए और बन गए एक अदद पति

अब हमारी इतनी ही दुआ है

जल्दी शादी निपटाए के मन ले हनी मून
नहीं तो बच्चे जायेंगे पीने तेरा खून

साथ में एक सलाह है

बुलाईये सभी मित्रों को शादी में भले ही निमंत्रण हो मौन
बेहतर इससे की लोग घर में घुसते ही लोग पूछे भाई ये नया माल कौन

Friday, March 12, 2010

यूँ ही अईसे ही

मेरे दिल में बसा
कोई ख्वाब हँसा
तो लगा की ये दिन ख़ास है
मुस्कुरा के सुबह
जो यूँ धरती पे आई
जैसे सुहानी सी सौगात है
जब जमीं पे पड़ी
वो पानी की बूँदें
क्या खुशनुमा सा ये एहसास है
गीली रेत पे छोटे
क़दमों के निशान
एक लम्बे सफ़र की शुरुआत है
छोटे छोटे मोती हैं
ये आपस में गूंथे हुए
सोचो तो कितनी ही खूबसूरत ये कायनात है

Saturday, February 20, 2010

सालों कहा चले गए हो ??

सालों कहा चले गए हो
या फिर मै कही दूर निकल आया हूँ
भोर की तलाश में क्षितिज से दूर
जाने किन अंधेरों को साथ लाया हूँ

बहुत याद आती है वो रातों की गप्पें
वो दिन की धमाचौकड़ी
अब नहीं भाती हैं ये सुनसान रातें
और दिन की उलझनें

ऐसा लगता है "र" रह गया है यंहा
और "मन" कही और चला गया है
ऐसी आपाधापी की ज़िन्दगी में
अब बचा क्या भला है

इतने बड़े शरीर पे अब
ये छोटा सा दिल भारी हो गया है
ढूँढ़ते ढूँढ़ते तुम लोगो को
थक कर ये सो गया है

आ जाओ वापस या
मै ही आ पहुँचता हूँ
एक प्याली चाय अब साथ
किसी के पीने को तरसता हूँ

जैसे जैसे वक़्त ये
आगे बढ़ता जा रहा है
जंगल और चिड़ियाघर
का फर्क समझ में आ रहा है


चिड़ियाघर में हो गा आराम ज्यादा
अच्छा खाना और शायद डर नहीं होगा
कितना भी हो खुबसूरत वो मंज़र
मगर अपना घर नहीं होगा

शायद कल नयी सुबह हो और
और फिर तुम में से कोई यंहा न हो
कोशिश जरा सी कर के देखना
शायद हम ख्वाब में फिर से एक बार साथ हों
और इससे बेहतर न दूजा कोई जंहा हो

कॉपीराइट रमन शुक्ला :)

धत पागल हो गए हो क्या !!

याद करो कोचिंग या क्लास में बैठे हुए बगल वाले लड़के का कहना की देख बे वो तुम्हे ही देख रही है , फिर खुद ही बाकि क्लास में खबर फैला देना की वो हमें ही देख रही थी तब सबसे अछे दोस्त का पास आके पूछना "क्यूँ बे सीरियस हो क्या बे " तो जवाब में मुह से बस यही निकलता था "धत पागल हो गए हो क्या " !! कितना पुराना पर प्रासंगिक वाक्य है ये । शायद ही कोई ऐसा हो जिसने ये वाक्य न प्रयोग किया हो , शायद यही वो वाक्य था जिसके प्रयोग करते ही समझ में आ गया था की "मन मन भावें मूड हिलावें " का प्रायोगिक अर्थ क्या है । आश्चर्य तो तब हुआ जब हमने साल दर साल इस वाक्य की पुनरावृत्ति अनगिनत (अतिश्योक्ति अलंकार है कम से कम ५-६ बार तो गिन ही लो ) बार की ।
खैर क्या किया जा सकता था हम उस देश का हिस्सा है जो पिछले ६० सालों से पडोसी देश पाकिस्तान से प्यार मांग रहा है , पर इस देश के किसी नागरिक को अपने ही पडोश में रहने वाली कन्या के साथ प्यार का लेनदेन करते हुए पकडे पाए जाने लड़के को आवारा और लड़की को पता नहीं किन किन विशेषणों से प्रसिद्ध कर दिया जाता है, बस उन्ही अवांछनीय शब्दों और उन हिकारत भरी निगाहों से बचने के लिए हम आज भी कहने से चुकते नहीं हैं "धत पागल हो गए हो क्या !! "

Friday, February 19, 2010

Wo

दिलासे दिल को देते हैं ,
मुंह से उफ़ नहीं करते
मालूम उस घर का रास्ता है
मगर वो रुख नहीं करते
खामोश बैठे हैं वो हमारा
किसी से जिक्र नहीं करते
अब हमको भी लगता है
वो हमारी फ़िक्र नहीं करते

Sunday, February 7, 2010

मराठी मानुष बाकि क्या आचार??

मै अपने विचारों में खोया हुआ सड़क के किनारे किनारे चला जा रहा था । शीत ऋतु उसी तरह ढलान पे थी जैसी कल की सफल अभिनेत्री तब्बू आजकल हैं और धूप दीपिका पदुकोने की तरह इठलाते हुए यत्र तत्र सर्वत्र अपने जलवे बिखेर रही थी और सभी लोगो ने अपनी अपनी उम्र के हिसाब से अपने अपने मंवंक्षित स्थान ग्रहण कर लिए थे इस धूर का प्रसाद ग्रहण करने के लिए जैसे की बूढ़े घर के बहर समूह में कुर्सियों पे बैठे हुए थे महिलाएं अपने अपने घरों की छत पे विराजमान थी बचे गलियों में दौड़ लगते हुए नाना प्रकार के खेल खेल रहे थे। तभी अचानक से एक उड़नखटोला प्रकट हुआ और उसमे से एक आदमी ने मुझे बलपूर्वक अपने साथ बैठा लिया उसके रंग रूप और वेश भूषा को को देख के लगा की इस विचित्र प्राणी का नाम नारद हो सकता है । खैर जैसा की पुराणों , रामायण और महाभारत में लिखा हुआ है हम ठुन्न की आवाज के साथ एक अजीब सी नयी जगह पहुच गए ... दिमाग पे बहुत जोर डालने के बाद भी वो जगह कदापि भी पहचानी हुई नहीं लगी , विदेश जैसा कुछ नहीं था और खैर भारत जैसा तो बिलकुल भी कुछ नहीं था , "प्रभु हम धरती से एक मानव को ले आये हैं ", नारद के इस स्वर ने हमारे अवलोकन को भंग किया और तब हमने देखा सामने प्रभु गणपति विराजमान हैं , उन्होंने बिना अपना हथिनुमा सर उठाये कहा की अभी पल भर ठहरो पहले इस "गणेश छाप तम्बाकू " वाले से निपट लेने दो, नारद ने बिना किसी विलम्ब के कहा महाराज आप लगता है की भूल गए हम इस मानव को "मराठी " समस्या के समाधान के लिए लाये हैं । इतना सुनने की देर थी की प्रभु ने तुरंत इस नज़र से देखा हो जैसे की हमारे नाम पे ५०००००००००० स्वर्ण मुद्राओं का पुरस्कार घोषित था और अब हमें पकड़ लिया गया है , खैर हमारा शिख से नख तक अवलोकन करने के बाद बोले की इसका अकाउंट ले आओ तो हम तुरंत बीच में बोल पड़े की गुरुवार अकाउंट खली है और क्रेडिट कार्ड हमारे २ साल से बंद पड़े हैं तुरंत जवाब आया "मुर्ख हम जीवन के बहीखाते की बात कर रहे हैं " चलो सांस में सांस आई नहीं तो भरे स्वर्ग में बेईज्ज़ती हो जाती । फिर गणपति बोले की डरो मत हमने एक सुर्वे के लिए तुम्हे क्रमरहित चुनाव के जरिये लाया गया है और हम तुम्हे कुछ समस्याएं बताना चाहते है और कहते हैं की तुम उन समस्याओं को लेके राज ठाकरे से हमारे लिए बातचीत करो । अब हम ठहरे टेक्नीकल आदमी तुरंत सुझाव दिए की भगवन हमें इस पचड़े में मत डालो पहले ये बताओ की स्वर्गलोक में ब्रॉडबैंड है की नहीं?? तो उन्होंने बताया की हाँ अभी अभी लगवाया है एयरटेल का है मैंने कहा बस तो फिर समझो काम हो गया हम आपकी यही से जी-टॉक पे आपकी ठाकरे साहब से सीहे बात करा देते हैं क्यूंकि जिनसे बच्चन साहब और शारुख खान नहीं बात कर पे तो मै अदना सा प्राणी क्या ही जा पाउँगा । भगवन ने तुरंत हमारी पीड़ा को समझा और हमारे बताये हुए साधन से चैट करना शुरू कर दिया प्रस्तुत है चैट का हाथों टाइप किया हुआ हाल:
गणपति: भो बालक क्या चल रहा है ??
र ठाकरे: अरे कौन नोर्थ इंडियन हमें पिंग कर रहा है ये भो**** वही के लोग ज्यादा कहते हैं
गणपति: अरे मुर्ख मै वो हूँ जो हर साल तुम्हे सँभालने आता हूँ और तुम मुझे बार बार सागर में वापस फेक देते हो , मैंने वो गाना भी सुना है "तुम्हे दर्शन देने आना ही होगा " और जब मै आता हूँ तो तुम लोग मुझे वापस समुन्दर में फेक देते हो , आजकल तुमने वह पर जो छीछालेदर फैला राखी है उसे समाप्त करने का जिम्मा हमें दिया गया है ।
र ठाकरे: अरे गणपति !! तू कसा आला?
गणपति: कृपया रास्त्रभाषा हिंदी का प्रयोग करे हमें ये चैट रिपोर्ट भगवन शंकर को देनी है उन्हें संस्कृत और हिंदी के अलावा सिर्फ लातों की ही भाषा आती है
र ठाकरे: मे काय केला पईझे मतलब की ई क्या कर सकत हूँ इस मुद्दे के अलवा हमने पिछले कुछ सालों मे कुछ किया ही नहीं है तो वोट कहा से मिलेंगे चुनाव मे।
(इतनसुनते ही गणपति क्रोधित हो गए सोचे की मराठी "मानुष" बाकि क्या आचार?? मैंने भी गणपति को बतया की अभी इन्होने अपने यंहा रहने वाले गैर मराठी लोगों को मर-मर के भाग्या है और जब यही काम ऑस्ट्रेलिया वालों ने किया तो इन्होने उस देश के क्रिकेट खिलाडियों के महारास्ट्र मे न खेलने देने की धमकी दे डाली तो इस हिसाब से तो हमें सचिन तेंदुलकर को टीम से निकल देना चाहिए... इतना काफी था गणेश जी को उकसाने के लिए इसके बाद की बात आप ही देख लीजिये )
गणपति: **&&^%^%$$$@@##@#@#@#@##@ तुम्हारी तो @#$#!$^%^@)*&
र ठाकरे: अरे मै क्या॥ मुझे क्यूँ ..........
गणपति; $#$#$#$#&#&#&*#&#&&#^^#%#^#%$^$#^%%^!&!&!&!^)^
..........
.......... .......... .......... ..........
..........
..........
..........
गणपति: अब और कुच्नाही कहूँगा देख लो २०१० मे सुधर जा वरना कुंडली तो तुम्हारी भी मेरे हाथ मे ही है वैसे भी मुझे डुबो डुबो के समंदर ख़राब खरने से मेरा दिमाग ख़राब है और अगर अब तुम्हारी वजह से सचिन को टीम से निकला ये बच्चन साहब की फिल्मे आना बंद हुई तो तुम्हारी खैर नहीं....

इतने मै संभला तो देखा सामने एक बाइक वाला मुझे पे चिल्ल रहा था की "देख के चल वरना तेरी खैर नहीं " मैंने अपने विचारों और क़दमों को सँभालते हुए अंगडाई ली और मंद मंद मुस्कुराते हुए ये सोच के आगे बढ़ गया की "मराठी मानुष बाकि क्या आचार??"

Wednesday, January 6, 2010

दिल की शिकायत

गौर किया तो लगा दिल की शिकायत सही है
आज कल कलम की हम पे इनायत नहीं है
हुए दूर कागज़ और स्याही से अब हम
कहते हैं लोग बदल मेरी इबादत गयी है

जो थी कल तक कैफियत और जो दस्तूर था
जो जारी कल तक बदस्तूर था
शायद अब वो नियत बदल गयी है
वो था दिन दूसरा जिसकी शाम ढल गयी है

बेमौसम बारिश की किसे प्यास है
पर कुछ बूंदों की तो हमें तलाश है
फिर अब पुरानी स्याही से लिखनी इबारत नयी है
मान लेते हैं वो आरजू जो अपने दिल ने कही है

कॉपीराइट रमन शुक्ला :)

Friday, January 1, 2010

Resolution of new year 2010 नव वर्ष के क्रन्तिकारी परिवर्तन

Nothing can be better to start writing all this here now , as its only 2:30 past to New year 2010 just started.
वैसे तो हम सभी अपने अपने मन में कुछ न कुछ सोच के रखते हैं की नए साल में ये करेंगे वो करेंगे और कुछ न हुआ तो सब कुछ करेंगे !!!! :प फिर मैंने सोचा की मन में सोच के रखने से क्या फायदा बेहतर है की मै इन कर्नातिकारी परिवर्तनों को यंहा सार्वजनिक रूप से लिख दूं जिससे की इस वर्षोपरांत मेरे अलावा बाकि भी ये सुनिश्चित कर सके की वास्तव में मैंने उन लक्ष्यों को हासिल किया या नहीं !!

१) सर्वप्रथम मै इस वर्ष के बाद अब और कुंवारा नहीं रहना चाहता तो not priority but I will try to search a fellow companion for my journey of life.

२) पिछले कुछ वर्षों से मै हर वर्ष लेह जाने का कार्यक्रम बनता हूँ पर किसी न किसी वजह से जा नहीं पाया हूँ परन्तु इस ग्रीष्मावकाश में मै निश्चित ही लेह जाऊंगा

३) इस साल मै २ कार खरीदना चाहता हूँ एक अपने पिता जी के लिए और एक अपने लिए

४) I am still short to complete my both novels which I have started last year so I am more than willing to get both these novel published by any chance

५) last but not the least I want to scale up my company to 50 employees and almost 2 million USD revenue

Lets see how much of these I am able to achieve.. wish me luck and encourage me time to time so that I can achieve all these this year.

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...