Monday, December 3, 2018

Parakh

बायें ज़ेब  मे उनके मरहम था
  पर वो आग लगा के चल दिए
सफाई देके करना था रफ़ा दफ़ा
 और वो दाग लगा के चल दिए

Tuesday, November 27, 2018

मुझे क्या चाहिए ??

बंद शीपियों मे बस मोतियों को दे दो
भरा मन मे ये छलाव नही चाहिए
राह ढूँढने को अब बस लौ ही काफ़ी है
लश्करों  के अलाव नही चाहिए
घड़ी की सुइयों सा  बस बढ़ते बदलते रहो
कोई आमूलचूल बदलाव नही चाहिए
अंकुर सा फूट पड़ो और मिट जाओ ओस सा
अनर्थ ही रहो धरा पे ऐसा ठहराव नही चाहिए
बंद शीपियों मे बस मोतियों को दे दो
भरा मन मे ये छलाव नही चाहिए

Saturday, November 24, 2018

यादें हैं की पन्ने हैं

बिखरे हुए पन्ने फैले हुए थे 
वो पन्ने जो स्याही के निशान से मैले हुए थे 
कुछ ताज़ा याद की मेज से गिरे थे
तो कुछ यादों की दराज़ों से बह निकले थे
हवा की ठोकर से जिल्द पन्नों से रूठ गयी थी
बिखरे थे पन्ने  की शायद कोई खिड़की खुली छूट गयी थी

Wednesday, November 21, 2018

ज़िंदगी है क्यूंकी अधूरी है

ज़िंदगी है क्यूंकी  अधूरी है
कुछ रह जाए कुछ मिल ना पाए
ये भी ज़रूरी है
कुछ नही मिला कुछ खो गया
कुछ दूर था चाँद सा कुछ
 मिला सपनों मे जब मै सो गया
नही सब अपना हो सकता
अच्छा है पूछना किसी से उसकी भी मंज़ूरी है
हाँ ही बोले ये भी नही ज़रूरी है
ज़िंदगी है क्यूंकी अधूरी है 

Tuesday, November 13, 2018

मै परिंदा रहना चाहता हूँ

इतना खो के सब मिला की  मै शर्मिंदा  रहना चाहता हूँ
 जाते जाते जान के भी मै ज़िंदा रहना चाहता हूँ
अब आराम से बैठने को ज़मीन बहुत है
पर इस खुले आसमान मे मै परिंदा रहना चाहता हूँ 

Monday, November 12, 2018

कुछ कम है मेरे पास

कुछ कम सा है मेरे दिमाग़ मे
और कुछ कम सा है दिल मे भी मेरे
कुछ दिन भी कम हो गये हैं मेरे वक़्त मे
और कुछ मुस्कुराहटें  भी कम हैं
कम हो गयी है कुछ चाय की   प्यालियाँ
सुनने  वालों ने बताया की कमी है शब्दों की मेरी कविताओं मे
ये जो तुम सब का सोच लेते हो अपने दिमाग़ से
और समेट लेते हो सब कुछ इस दिल मे
जो वक़्त शायद बिता सकता था तुम्हारे साथ
और हस सकता था कुछ लम्हे दिल खोल कर
वो लकड़ी की मेज पे ख़टकते चायके प्याले जो बिना तुम्हारे ठंडे हो गये
और वो जो कभी कह नही पाया तुम्हारे सामने
यही सब कम है मेरे पास , जो कम है वो बस तुम हो


Friday, October 19, 2018

दूरी बनी नही बस हमने बना ली है

समझने वाले समझ गये होंगे
की ये दूरी बनी नही बस हमने बना ली है
आत्मसमर्पण कर दिया अब चल रहे है ऐसे की
एक दूसरे को पीठ दिखा ली है
दूसरों का कुछ ज़्यादा नही बस चार लोग क्या कहेंगे
ये सोच के रज़ामंदी बना ली है
ठिठक ठिठक कर सोच सोच कर
बोली हर बात तोल मोल कर
इस चक्कर मे तुमसे ना  जाने कितनी बाते तुमसे छुपा ली है
हवा मे खुले काग़ज़ों की तरह फैल रहीं थी
वो सारी इच्छायें हमने कही अंदर दबा ली हैं
नही चल सकते शायद एक रास्ते पे साथ साथ
ये बात मुश्किल से ही सही पर दिल को समझा ली है
समझने वाले समझ गये होंगे
की ये दूरी बनी नही बस हमने बना ली है

Thursday, October 18, 2018

बस रहे फ़िक्र इतनी

तुम्हे बस रहे फ़िक्र इतनी
की जितने जलाओ दिए बुझ  ना पायें
की जितने बसाओ गुलशन लूट ना जायें
बस रहे फ़िक्र इतनी की ऐसा ना बोलो
की कही कोई नब्ज़ दुख ना जाए

Thursday, September 27, 2018

Cutting My Losses

पता नही बातें अच्छी  लगती हैं या आवाज़ अच्छी लगती है तुम्हारी
हाँ ये पता है की मेरा बार बार कुछ पूछना  तुम्हे अच्छा  नही लगता
तुम बेपरवाह और आज़ाद  थे और मै भी जाने देता हूँ
पहले से जो होता आया है एक बार और होने देता हूँ
जाने देता हूँ उन सवालों को जिनके शब्दों की गर्मी ने पिघलाई थी बर्फ हमारे बीच की
जाने देता हूँ उन जवाबों जो साथी - सांगी हैं मेरे सूनेपन के
जाने देता हूँ उन ख्वाहिशों को जो मुझे उकसाती है हर रोज़ तुमसे मिलने को
जाने देता हूँ उस दुनिया को जो छोटी सी थी लेकिन मेरी थी
अब नही उछालूँगा वो घिसे पिटे सवाल रोज़ रोज़
और ना ही लगाऊँगा तुम्हारे वक़्त मे सेंध कभी
जिन यादों के लिफाफो  पे लिखा कोई पता नही
जायज़ यही की उनको खो जाने देता हूँ
  पहले से जो होता आया है एक बार और होने देता हूँ

Thursday, July 12, 2018

यादें

मयस्सर नही यादें घाव  देने वालों की
  बस मौजूद है उनकी जो सुकून बसा गये
फेहरिस्त बहुत लंबी थी रुलाने वालों की
 अब शाम की चाय पे वो याद आते हैं जो कभी हॅसा गये 

Monday, June 18, 2018

bas yunhi khayaal aaya..

आसमान दफ़न कर सकूँ इतनी ज़मीन कहा से लाऊंगा
ता उम्र के किससे हैं एक रात मे कैसे सुनाऊंगा

Tuesday, June 5, 2018

तुम मुझे शून्य दो

तुम मुझे शून्य दो
मै सौ बना दूँगा
ज़ादू नही है कोई
एक को लाना होगा
और एक एक करके निन्यान्वे बार लाना होगा
मुश्किल है पर कर संभव दिखा दूँगा
तुम मुझे शून्य दो
मै सौ बना दूँगा
कर जोड़ कर
गढ़   जोड़ कर
विलास देकर या विश्वास दिलाकर
दल मजबूत बना लूँगा
तुम मुझे शून्य दो
मै सौ बना दूँगा
कही हर कर कही हार कर
पैनी सबकी धार कर
सहभागी अविजय बना लूँगा
तुम मुझे शून्य दो
मै सौ बना दूँगा

Tuesday, May 22, 2018

जहन मे


सुबह से शाम से मिलता हूँ कन्स कुम्भकरण और रावण से
पर कही ना कही  जहन  मे मिलते हैं राम भी
दिन गुज़ार देता हूँ मुफ़लिसी और बेबसियों मे
फिर भी जहन मे मिलते हैं करने को कुछ काम भी
दूर रहते हैं कितने भी तुम हमसे और हम तुमसे
 फिर भी अपना ऐसा है की जहन मे मिलते हैं हम हर शाम ही

Wednesday, April 18, 2018

kuch panktiyan wakt ke pannon se

kabhi shabdon ko adal kar badal kar
kabhi bebak kabhi sambhal kar
hum yahi kahte rahe hain 
tum tak hi pahuchenge , 
aaye seedhe ya aaye tum tak fisal kar

तकियों मे कब से नींद छोड़ आए हैं
और छोड़ आयें हैं चादरों मे सलवटें
जब से तुम रात मे जागने लगे हो

छोड़ आए हैं हम वो नींद की करवटें

मेघ  आए पर  ना  आई बारिश
कही  तुम परेशान  हो  क्या 
घुलती  शाम मे  भी  ना आए  ठंडे  झोंके 
कही  तुम अधूरे  अरमान  हो क्या  
नींद  आई पर  तुम  ना आए  ख्वाबों मे  
मेरी  तरह   तुम  भी  बिखरे समान  हो  क्या

हमारे  पास तो  तुम्हारे  लिखे  खत  भी  नही  हैं
ना ही  कोई  सौगात  और  तॉहफ़ों  की  गिनती  है  
फिर भी  पता  नही  ऐसा  क्या    गया  है मेरे पास  तुम्हारे  पास  से  
की बस  लगता  है  कुछ  रह  गया  है  मेरा  तुम्हारे  पास  

चन्द लम्हे हैं  बिताए  हुए  बस  तुम्हारे  साथ  
कुछ धूप  मे  और  कुछ  उस  चाँद  के  नीचे  घिरी  रातों  मे  
इतना कितना मोल  होता  है  लम्हों  का  की  
लगता है  सब  कुछ  बेच  आया  हूँ  उन  कुछ  लम्हों  को  खरीदने  मे


Monday, April 16, 2018

She

She has given it
and she has taken it away
by her charm, by her calm
she is the one who invited
and yet she is the
one who forgot By the way

she being there
I was dreaming and happy
her guard and her candour
kept me around and sway
she was polite and left me alive
though she could have taken everything away

Friday, April 13, 2018

माँ और बेटी

किल्कारी भर के कल ही तो तुम आई थी,
इतनी भी पुरानी बात नही जब तुम मुझमे समाई थी
इन यादों के तुम भूल भी जाओ
ना भूलना नित नयी यादें बनाना
बड़े होके बस थोड़ी मुझ सी हो जाना थोड़ी खुद सी हो जाना

रात सबेरे का ज्ञान नही, बस मर्ज़ी से जग जाती हो
हाँ तुम ही हो मुझसे ये शायद समझाती हो
वक़्त बेवक़्त का हिसाब नही बस देख मुझे इठलाती हो
लगा के उर से जब थपकी दूं तो शांत भाव से सो जाना
बड़े होके  बस थोड़ी मुझ सी हो जाना थोड़ी खुद सी हो जाना

मानव मानव मे भेद नही बस सबकी अंक मे छुप जाती हो
स्थिर अस्थिर कर देती हो
जब बस तुतला के  माँ बोल बुलाती हो
अंक और अक्षर लगते एक जैसे बस रंगों का भेद है जाना
बड़े होके  बस थोड़ी मुझ सी हो जाना थोड़ी खुद सी हो जाना

Wednesday, April 11, 2018

इश्क़ के हज़ारों रंग

वो बता के चल दिए की इश्क़ के हज़ारों रंग
हमारा रंग कौन सा बस ये नही हमे पता
 पर शायद स्याह सा होगा
और गहरा भी होगा
गतिमान नही होगा
उदास  सा और ठहरा सा होगा
ऐसा होगा जो बस किसी का ना सुनता हो
शायद कुछ बहरा सा होगा
हुस्न के हज़ारों रंग
मेरा शायद सब रंगों पे कोहरा सा होगा 

Saturday, April 7, 2018

क्या हो तुम?

क्या हो तुम
जो करीब हो तो छोटी हो जाती हैं रातें
भाग जाता है वक़्त पैमानों से भी आगे
कुछ याद नही रहता दुख भरा
ना ही  चिंता रहती है कल की
दर्द भी याद  नही रहते
दवा की ज़रूरत नही रहती
जादूगर हो कोई क्या?
क्या हो तुम?


Sunday, March 25, 2018

Apne paraaye

इन ज़मीन के टुकड़ों मे अपनों के कुछ घर थे जो दूसरों के मकानों मे तब्दील हो गये ..

   समझाने को मुझे  इस बदलाव की खूबसूरती मेरे अपने भी कुछ वक़ील हो गये 
- Raman Shukla

Sunday, March 18, 2018

Ran ki tayiyaari

सन्त्रप्त इस विपत्ति काल मे निंद्रा कोसों दूर हो
 भौंहे चढ़ि तन ताना जैसे खड़ा कोई वीर शूर हो
तैयार रण को हो तेरे हाथों मे शश्त्र शत्रु के काल हो
समय आक्रमण का है ना किंचित मन मे भी कोई ढाल हो

Thursday, March 15, 2018

मुख्तसर अपनी मुलाकात होती है

सोचता रहता हूँ लंबी होगी बातों की फेहरिस्त
पर मुख्तसर अपनी मुलाकात होतीं हैं
यादों के साए मे बीत जाते हैं दिन
मुश्किल  बिताना वो छोटी सी रात होती है
गैर मौजूदगी मे तेरे मौसम तो सारे बीत जाते हैं
 बस मुश्किल बिताना वो बरसात होती है
इतना भी वक़्त नही मयस्सर की खो जाऊं  तुझमे
की बस मुख्तसर अपनी मुलाकात होती है

Friday, March 9, 2018

जब वो नाराज़ होते हैं !!

तकब्बुर लगेगा लोगो को तेरा ये लहज़ा
हमे तो ये अंदाज़ - ए- रग़बत  लगता है
एक मुअम्मा होगा दूसरों की समझ ले लिए
हमे ये ज़रिया - ए-  कुरबत लगता है 

Friday, February 9, 2018

क्या मेरे तेरे दरमियाँ है

सुर्ख अहसास हैं कही साझा ज़ज्बात है कहीं
झूले से पास आते और कभी दूर जाते हालात हैं कहीं
छुपाने को सभी से कभी रात की वीरानीयाँ हैं
मत पूछ की क्या मेरे तेरे दरमियाँ है

सवालों की फेह्रिश्त है उम्मीदों की उलझने है
कहीं बिखरते और कही बनते सभी के सपने हैं
बात से बेहतर एक टक एक दूजे को देखती खामोशियाँ है
अब मत पूछ की क्या मेरे तेरे दरमियाँ है

अलग शहरों के मिज़ाज है पर संग संजोते ख्वाब है
साथ बिताए हुए लम्हों की खुशी बेहिसाब है
अब शाम ढलने को एक साथ लंबी होती परछाईयाँ है
अब मत पूछ की क्या मेरे तेरे दरमियाँ है
सुर्ख अहसास हैं कही साझा ज़ज्बात है कहीं
झूले से पास आते और कभी दूर जाते हालात हैं कहीं
छुपाने को सभी से कभी रात की वीरानीयाँ हैं
मत पूछ की क्या मेरे तेरे दरमियाँ है

सवालों की फेह्रिश्त है उम्मीदों की उलझने है
कहीं बिखरते और कही बनते सभी के सपने हैं
बात से बेहतर एक टक एक दूजे को देखती खामोशियाँ है
अब मत पूछ की क्या मेरे तेरे दरमियाँ है

अलग शहरों के मिज़ाज है पर संग संजोते ख्वाब है
साथ बिताए हुए लम्हों की खुशी बेहिसाब है
अब शाम ढलने को एक साथ लंबी होती परछाईयाँ है
अब मत पूछ की क्या मेरे तेरे दरमियाँ है

Kya khareedun?

कुछ यादें खरीद लो, कुछ साँसे खरीद लो
खरीद लो वो चश्मा जो हमे हमारी ग़लती दिखा दे
कुछ माफियाँ खरीद लो बचपन की वो टफियाँ खरीद लो
या खरीद लो वो डब्बा जो इंसानियत सीखा दे
क्या कहा इनमे से कुछ नही मिल रहा !!!
तो जाने दो उन सिक्कों को जो सिर्फ़ तुम्हारी जेब भर देंगे
ज़रूरत पड़ेगी तो सिर्फ़ दो गज़ ज़मीन की
उसका इंतज़ाम तो गैर भी कर देंगे

कल रात एक खिड़की खुली छूट गयी


कल रात एक खिड़की खुली छूट गयी
चाँद की रोशनी, कुछ फूलों की खुश्बू और
कुछ नीरव आवाज़े अपने साथ ले आई तुम्हारी यादें 

वो शुन्य को निहारती तुम्हारी आँखे
बायें गाल पे झूमती वो जुल्फें 
वो यादें जिनमे तुम्हारा 
दिखाना की नही देख रही हो तुम 
इतना ही नही वो यादें लाई थी वो पल
जिनमे तुम दिनो मे मानी जबकि 
पलों मे रूठ गयी थी 
इनके साथ गुजर गयी रात मेरी क्यूंकी 
कल रात एक खिड़की खुली छूट गयी थी

Friday, January 19, 2018

मै सूरज हूँ

मै सूरज हूँ
कल सुबह फिर निकल आऊंगा
चीर के अंधकार को
भेद के धुन्ध के गुबार को
फिर धरती  पे आ जाऊँगा
बनूंगा जीवन किसी के लिए
किसी को प्रचंड ताप से झुलसाऊंगा
मै सूरज हूँ
कल सुबह फिर निकल आऊंगा
बुझाने को अंधेरा
बार बार जल जाऊँगा
निपटा के अपना काम
हर शाम मै ढल जाऊँगा
आज बुला लो कितनी भी रातें
सुबह कल मै फिर आऊंगा
मै सूरज हूँ
कल सुबह फिर निकल आऊंगा

Wednesday, January 17, 2018

Bas yahi farak hai...

Bas ek farak hai chand aur tumme
Ki qo roz badalta hai
Bas ek farak hai chand aur tumme 
Ki wo roz dhalta hai

एक याद थी अधूरी सी...

एक याद थी अधूरी सी
एक छोटी सी रात की 
उसमे आवाज़ें गूँजती थी 
एक अनकही सी बात की 
रास्तों के शोर मे 
शहर की भोर मे 
वो याद ढलती गयी 
समस्यायों के निदान मे 
भविष्य के संज्ञान मे 
सबके पीछे वो चलती गयी
 सही के उल्लास मे
ग़लत के शोक मे 
तिल तिल करके वो जलती गयी 
थी गल्ति या नही 
सोच के वो ग़लती गयी
अदखिले से फूल देख के
गुनगुनी धूप सेंक के   
मगर लौट वो आती थी 
चेहरे पे देख लट लटकती
जब पन्नों पे ये उंगलियाँ भटकती 
हर मर्तबा वो लौट आती थी 
बन के भीगी सी आँख सी 
बन के भारी सी साँस सी
वो जो एक याद थी अधूरी सी
एक छोटी सी रात की 
उसमे आवाज़ें गूँजती थी 
एक अनकही सी बात की

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...