कभी कुछ सोच के है होता
कभी कुछ यूँ ही है हो जाता
जो पहले गिरने की भनक भी होती
तो क्यूँ मै रेत के महल बनाता
निकला था सबेरे का देखने सूरज
होता बेहतर अगर मै
शाम ढलने से पहले पहुच जाता
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Monday, December 27, 2010
Thursday, December 9, 2010
फॉर AP
जिसको आदत थी मेरे कंधे की
कैसे उसने दूसरे के कंधे पे संभाला सर होगा
मेरे दिल सोच के कश्मशाता है
नया आया जो होगा उनके दिल में
देखा उसने वहां मेरा पुराना घर होगा
कैसे उसने दूसरे के कंधे पे संभाला सर होगा
मेरे दिल सोच के कश्मशाता है
नया आया जो होगा उनके दिल में
देखा उसने वहां मेरा पुराना घर होगा
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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मेरे दिल में बसा कोई ख्वाब हँसा तो लगा की ये दिन ख़ास है मुस्कुरा के सुबह जो यूँ धरती पे आई जैसे सुहानी सी सौगात है जब जमीं पे पड़ी वो पानी ...
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सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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गुजर जाओ यहा से तो कभी लौट के भी आना है तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ यह बताने के लिए और तुम हो की डर से सिमाटते जा रहे हो खुद को मुझ...