Tuesday, November 27, 2018

मुझे क्या चाहिए ??

बंद शीपियों मे बस मोतियों को दे दो
भरा मन मे ये छलाव नही चाहिए
राह ढूँढने को अब बस लौ ही काफ़ी है
लश्करों  के अलाव नही चाहिए
घड़ी की सुइयों सा  बस बढ़ते बदलते रहो
कोई आमूलचूल बदलाव नही चाहिए
अंकुर सा फूट पड़ो और मिट जाओ ओस सा
अनर्थ ही रहो धरा पे ऐसा ठहराव नही चाहिए
बंद शीपियों मे बस मोतियों को दे दो
भरा मन मे ये छलाव नही चाहिए

Saturday, November 24, 2018

यादें हैं की पन्ने हैं

बिखरे हुए पन्ने फैले हुए थे 
वो पन्ने जो स्याही के निशान से मैले हुए थे 
कुछ ताज़ा याद की मेज से गिरे थे
तो कुछ यादों की दराज़ों से बह निकले थे
हवा की ठोकर से जिल्द पन्नों से रूठ गयी थी
बिखरे थे पन्ने  की शायद कोई खिड़की खुली छूट गयी थी

Wednesday, November 21, 2018

ज़िंदगी है क्यूंकी अधूरी है

ज़िंदगी है क्यूंकी  अधूरी है
कुछ रह जाए कुछ मिल ना पाए
ये भी ज़रूरी है
कुछ नही मिला कुछ खो गया
कुछ दूर था चाँद सा कुछ
 मिला सपनों मे जब मै सो गया
नही सब अपना हो सकता
अच्छा है पूछना किसी से उसकी भी मंज़ूरी है
हाँ ही बोले ये भी नही ज़रूरी है
ज़िंदगी है क्यूंकी अधूरी है 

Tuesday, November 13, 2018

मै परिंदा रहना चाहता हूँ

इतना खो के सब मिला की  मै शर्मिंदा  रहना चाहता हूँ
 जाते जाते जान के भी मै ज़िंदा रहना चाहता हूँ
अब आराम से बैठने को ज़मीन बहुत है
पर इस खुले आसमान मे मै परिंदा रहना चाहता हूँ 

Monday, November 12, 2018

कुछ कम है मेरे पास

कुछ कम सा है मेरे दिमाग़ मे
और कुछ कम सा है दिल मे भी मेरे
कुछ दिन भी कम हो गये हैं मेरे वक़्त मे
और कुछ मुस्कुराहटें  भी कम हैं
कम हो गयी है कुछ चाय की   प्यालियाँ
सुनने  वालों ने बताया की कमी है शब्दों की मेरी कविताओं मे
ये जो तुम सब का सोच लेते हो अपने दिमाग़ से
और समेट लेते हो सब कुछ इस दिल मे
जो वक़्त शायद बिता सकता था तुम्हारे साथ
और हस सकता था कुछ लम्हे दिल खोल कर
वो लकड़ी की मेज पे ख़टकते चायके प्याले जो बिना तुम्हारे ठंडे हो गये
और वो जो कभी कह नही पाया तुम्हारे सामने
यही सब कम है मेरे पास , जो कम है वो बस तुम हो


वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...