Wednesday, August 19, 2015

आख़िरी शब्द .......

गर्द सी जमने लगी है फिर वहाँ रखी किताबों मे....
 उस कमरे मे फिर जाले लग गये हैं
अब हवाला मत दो अज़ीम हमे उन कमरों का
 जिनमे अब ताले लग गये हैं

ताले लग गये हैं और उनकी चाभी हमारे पास नही है
गुज़र जाने दो ये लम्हे और इनसे लिपटी ख्वाहिसे
इनका हिसाब रखना अब हमारे बस की बात नही है

नही बिकना हमे अब बढ़ी कीमतों के बाज़ार मे
क्यूंकी दाम इनमे हमारे पुराने वाले लग गये हैं
अब हवाला मत दो अज़ीम हमे उन कमरों का
 जिनमे अब ताले लग गये हैं ..... रमन शुक्ला

Wednesday, July 15, 2015

ये सारे आशिक़ बेचारे हैं


सरहदों के इस तरफ भी हैं और उस तरफ भी
शहर के मकानों मे भी हैं और गावों के झोपड़ों मे भी
फैले ये संसार मे सारे हैं ये आशिक़ बेचारे हैं
चाय की चुस्कियों के बीच अंगड़ाई लेके
कभी अख़बार पढ़ते हुए पेरिफिरल विजन के सहारे
कभी छोटे कंकड़ों को मारना उसके दरवाजे पे
और कभी पहुच जाना उनके घर पुरानी किताब माँगने
पता नही और कितने तरह से करते ये इशारे हैं
ये सारे आशिक़ बेचारे हैं
छोटी छोटी कहानियों के गुच्छे हैं इनके दिलों मे
यादों मे ही जी लेते हैं
बीते वो लम्हे जो सारे हैं
हक़ीकत मे तो जीते अब बस तस्वीर के सहारे हैं
ये सारे आशिक़ बेचारे हैं
 

Aadhi Adhuri...

aadha to chand hota hai
 .. aadhi raat hoti hai 
.. aadhi tamannayein hoti hai 
aadhi to baat hoti hai 
aadhi khwahishe hain
 aadhe raste hain 
aadhi kuch anpadhi kitabein hain 
aur kahi kahi to aadhe nisaan bhi hain ret pe 
beeti poori raat me aadhi li huyi neend hai
 ..aadha bistar aadha ghar aadha sahar

Monday, April 6, 2015

Aaaah!!!

अब्द कहो या आशिक़
 हम को इबादत ही करनी है
फ़र्क तो तब भी ना होगा
जब काफ़िर कहे जाएँगे


एहतमाम जबरद्श्त थे माहौले ए वश्ल के हमारे
 लेकिन एक बार और आपकी याद ही आई थी तन्हा बारात मे
माँगने को तो जमाना माँग लिया था हमने
 पर खुदा ने तो एक मुलाक़ात भी ना बख़्शी हमे जायदाद मे

Tuesday, March 31, 2015

Wasl

जब जब दरवाजे पे होता हूँ जाने के लिए
 तेरी याद मे एक हिचकी आ जाती है मनाने के लिए
रूठता नही हूँ बस कोशिश होती है तड़प दोनो की तौलने की
 वैसे भी सब छोड़ के आया हूँ तुझे पाने के लिए
ऐसा नही की मै समझता नही तेरी हक़ीकत
की तुझे भी चाहिए कुछ वक़्त इस दिल को साझाने के लिए
अफ़सोस नही मै भी जानता हूँ पगली
एक ज़िंदगी नाकाफ़ी है एक दूजे को पाने के लिए

Monday, March 30, 2015

Puraane Khat

पुराने खतों की स्याही मिट गयी
पर शायद लिखावट की गहराई अभी बाकी है
कभी इन पन्नों के दोनो तरफ हुआ करते थे हम दोनो
 पर शयब अब मेरे हिस्से की तन्हाई अभी बाकी है
सूख गये गुलाब के वो फूल इन खातों मे दबकर कही
 पर आज भी तेरे आँसुओं की परछाई इन खतों मे कही बाकी है

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...