Wednesday, January 29, 2020

संभलता बिखरता रहा हूँ मै

समेट के रखता हूँ खुद को तुमसे मिलने के इंतेज़ार मे
और मुलाक़ात के बाद हर बार बिखरता रहा हूँ मै

सयानों  ने कहा की मुलाक़ात  मे पर्देदारि रखना
इसीलिए रूबंद उठाने से झिझकता रहा हूँ मै

आज़ाब कभी  तुम्हारे कभी कभी मिलने का नही रहा
क्यूँ बीत जाता है इसलिए बस वक़्त से लड़ता रहा हूँ मै

बा सॅमयीन तब्दीली बहुत है मेरे मिज़ाज़ मे
कैसे बताऊं की तेरे ज़ायकों के हिसाब से बदलता रहा हूँ मै

ता उम्र का साथ ना मुयस्सीर का ख़याल बिखरने को काफ़ी था
बस कुछ चाँद रातें मिलोगे ये सोच के ही संभलता रहा हूँ मै

समेट के रखता हूँ खुद को तुमसे मिलने के इंतेज़ार मे
और मुलाक़ात के बाद हर बार बिखरता रहा हूँ मै

Wednesday, January 22, 2020

हम कौन ??

इन रिश्तों मे गहमा गहमी बनी रहती है
कभी गुनाह तुमपे साबित कभी गुनहगार हम निकले
समझा लेंगे ज़रूरत पड़ी जो वक़्त आने पे
इतने शातिर  तुम और इतने होशियार हम निकले
वक़्त के हिस्सों को बिना तुम्हे तकलीफ़ दिए ऐसे बाँट दिया है
इस कदर बेफ़िक्र तुम और खबरदार हम निकले
ज़रूरत पड़े ना मुझे तुम्हारी ना तुमको हमारी
कुछ इस कदर घर के दरवाज़ों से उस पार हम निकले
ना मुलाकात हो चेहरों की ना बातें हो आँखो की
कर के इस बात की ताकीद गली से हर बार हम निकले
कट जाए वक़्त दोनों का करके नज़रअंदाज़ गुनाह दोनो के
इतने बेपरवाह तुम और इतने समझदार हम निकले
इन रिश्तों मे गहमा गहमी बनी रहती है
कभी गुनाह तुमपे साबित कभी गुनहगार हम निकले


Wednesday, January 8, 2020

प्यार तो कर लो

किया नही तो कर लो
जी नही पाए तो मर लो
नही ध्यान दिया तो ज़ोर दो
जहा लगे वहाँ कोई निशान तो छोड़ दो
छोड़ो,  मत बड़ों का ऐतबार कर लो
एक ही मर्तबा सही प्यार तो कर लो

जाने दो डर की लोग क्या कहेंगे
इतना भी मत भरोसा करो बेवफ़ाई पर
कब तक सब सही करोगे
कोई तो ग़लती एक दो बार कर लो
इत्तेफ़ाक़न ना हो पाया हो तो जबारददस्ती ही सही
एक मर्तबा तो  प्यार कर लो

Tuesday, January 7, 2020

क्या ये है??

पिघले हम और भीगे कोई
     क्या ये है बादल हो जाना
ढूंढूं तुमको  भले मिलूं किसी से
      क्या ये है पागल हो जाना
हसने मे बहा दूं टीस के आंशु
      क्या ये है काबिल हो जाना
ना मिले तुम्हे कुछ ना मिले मुझे कुछ
   क्या ये है सब हासिल हो जाना

वक़्त गुजर दिया

उम्रदराज़ हो गये बस
टूटे ख्वाबों को जोड़ते हुए
काफ़ी वक़्त गुजर दिया
बिना लिखे खातों को मोडते  हुए
खुशी तुम्हारी और हम आंशू बहा दिए
दर्द खुद का निचोड़ते हुए
रूह फैल रही थी अब जब
तब रात बिता दिए जिस्म सिकोडते हुए
बहुत कुछ छू गये थे तुम
बस उनसे ही घर सज़ा दिया तुम्हे छोड़ते हुए
उम्रदराज़ हो गये बस
टूटे ख्वाबों को जोड़ते हुए

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...