Monday, September 21, 2009

Do you know, who are you? Yes I know who am I

I am not Raman Shukla. That is my name, I ever wonder are we an individual or am I an individual... Today while sitting alone and thinking me in past 26 years all of sudden I realized Raman Shukla is not a person he may look one body but he is not one person, he is a blend of a lot many person to whom he consider his close circle. Believe me if I never met them then I am dead body with a living soul. You guys know when I help any person Its my father in me who pushes me hard to do so. I often don't compete with any one but if I do so then its Rajat Gupta in me who do so. When I decide my goals its Ashesh Saini in me who decides goal without being afraid of size. Whenever I chase a vision decides my priority and talk tough to people in a polite way Its Sameer Singh not me. When I write a blog, story, novel or poem its Sachin Saxena inside me who propels me to pen down all this stuff. I play a little bit synthesizer and when I do so its one of my cousin Ashutosh Mishra in me. When I get in contact with every person at one time cleverly then its Mohan Agnihotri in me. If I am under heavy debt but still smiling then say Hi to Amit Pandey who has put this smile in me. If any thing comes up as a technical challenge and if u see me taking that head on then no cookies for guessing the name of Manish Sanwal. I am extravagant and spend a lot then sorry folks its Ranvijay Singh in me. Oh my God have u seen me to help any one who comes to me then Thanks to my mother who stays in me as well. I have loosed every thing I had but still standing somehow then its Soman Dubey and Santosh Pandey in me. I achieve my goal again its my team in me I did nothing. Though people don't find me innocent at the times but still if u ever felt so then its Sandeep Jain in me.Am i rigid for what I think then I got Shashank Mishra too inside me. So who am I, I am a blend of all above mentioned person but still not complete many more parts yet to join me to make me a perfect Raman Shukla. Try to find who are your parts and offer then their due respect, that's what I do.

Sunday, September 20, 2009

और शाम हो रही है ........

हम यंहा अहमदाबाद में बैठे है रविवार का दिन है तो अपने ऑफिस की खिड़की (विंडो word बड़ा ही माइक्रोसॉफ्ट टाइप लगता है.... है ना !! )से दिन ढलते हुए देख रहे हैं , अँधेरा तेज़ी से उसी तरह से बढ़ रहा है जिस तेज़ी से हमारे देश की आबादी... वैसे भी इतवार ग्लोबल छुट्टी होता है तो दिन भर लोग घर में hibernation के बाद अपने अपने घरों से रौशनी प्रिय पतंगों के माफिक रौशनी और भीड़ से चकाचौंध मॉल्स और मल्टीप्लेक्सेस की तरफ़ मुखातिब हो रहे हैं । उन सभी की पत्नियाँ खुश हैं की बहर जा रहे हैं वही से कुछ खा के आयेंगे आज तो कम से कम किचेन से छुटकारा मिला। किसी किसी घर से आरती की आवाज आ रही है (ग़लत समझियेगा ये भगवान् की प्रार्थना के बारे में था अपार्टमेन्ट की किसी लड़की का नाम नही ) शायद नवरात्री के चलते । दिन भर के अलसाये कुत्ते लोट पोट करके नाईट शिफ्ट के लिए उसी तरह तैयार हो रहे हैं जिस तरह किसी क्रिकेट मैच से पहले फील्डिंग साइड के प्लयेर्स मैच शुरू होने से पहले वार्म अप होते हैं रोड लाइट बिना किसी क्रम के ऐसे जल रही है जैसे होली का गुलाल मुरलीधरन पे उड़ा दिया हो जहा पड़ा वह चमक रहा है बाकि जगह अँधेरा । वो लोग जो कुंवारे है और बेरोजगार हैं अपनी पसंद की दुकान पे उसी तरह इकठ्ठा हो रहे हैं जैसे सुबह सुबह किसी फूल पे भौंरे एकत्रित होते हैं । अपार्टमेन्ट के वयोवृद्ध नीचे इकठ्ठा हो के विश्व और देश की आर्थिक व्यस्था पे चिंतन करने को एकत्रित हो चुके हैं वैसे भी व्यक्ति चिंतन उसी विषय पे करता है जिसके कार्यान्वन पे उसका कोई बस नही चलता। चिंतन की शुरुआत ही कार्य के असफल या आउट ऑफ़ कंट्रोल हो जाने पे ही होती है। अगर हम चाहे तो यंहा पर चिंतन और कार्यान्वन के सही क्रम को लेके एक विस्तृत विवेचना कर सकते हैं पर अभी समय उपयुक्त नही है । अरे वो देखिये ६-७ खिलाड़ियों का क समूह हाथ में क्रिकेट बैट एवं गेंद वगैरह लिए चला आरहा है सर झुके हुए हैं अर्थात हार के आ रहे हैं पर सीखना इनसे भी चाहिए आज हार गए तो आज ही क्रिकेट छोड़ नही देंगे कल फ़िर खेलने जायेंगे और किसी न किसी दिन जीतेंगे और फ़िर खेलने जायेंगे । मच्छर अपने अपने गुप्त ठिकानो से निकल कर रात्रि कालीन गोरिल्ला आक्रमण के लिए तैयार हो रहे हैं । अवश्य ही बुढ्ढे मच्छर युवक मच्छरों को "वीर तुम बढे चलो धीर तुम बढे चलो " जैसे गीत गा कर उत्साहित कर रहे होंगे और युवा मच्छर इन गीतों से बेपरवाह आपस में सलाह कर रहे होंगे की किस किस युवक और युवती का रक्त पान करना है as per their own taste as 377 is allowed. अरे हम जमीन पे इतना केंद्रित हो गए की असमान पे विचरण करने वाले इन पंक्षियों का तो हमें ध्यान ही नही रहा आईये उन्हें भबी देख लेते हैं चिडियां किसी कॉन्वेंट स्कूल के स्टूडेंट्स की तरह समूह में अपने घरों की तरफ़ चली जा रही हैं और कौवे किसी सरकारी स्कूल के लफ्फाजों की तरह से इस डाल से उस डाल पे कूदते हुए शाम के भोजन के लिए फाइट मार रहे हैं। बस अब तो शाम ख़तम भी हो गई रात का अँधेरा गहराने लगा है ....

साहस

ध्येय एक विश्वास एक
मन में बसी बस आस एक
तू भी अर्जुन बन जाएगा
बस पंछी की तू आँख देख

कर कठोर प्रयास तू
नित कर मगन अभ्यास तू
ह्रदय को ही गुरु तू मान ले
एकलव्य तू ख़ुद को जान ले

संचित जल सरोवर का नही
तुझे नदी का प्रवाह बन जाना है
सूरज के तप को ललकार कर
सागर से तुझको मिल जाना है

साहस , मान , स्वाभिमान से
तरकश में तेरे कई तीर है
अहो क्या और सौभाग्य हो
रण आहुति हेतु निज संपूर्ण शरीर है

सामान्य से संसार में
कुछ असामान्य तुझे कर जाना है
बहुत बड़ा है ये कारवां
उसमे स्थान विशिष्ट तुझे पाना है

इतिहास स्मरण मात्र नही करना अब
हमको इतिहास पुरूष बन जाना है
अभी आग ह्रदय में बाकि है
इतिहास अब हमको ही दोहराना है -२

copyright Raman Shukla

Friday, September 18, 2009

उड़ने को आगे आसमान बहुत है

क्यूँ करता व्यर्थ इस जीवन को
क्यूँ तुझे पर - निर्णय पे अभिमान बहुत है
एक तेरा निर्णय ही लायेगा परिवर्तन
परिवर्तन में ही है निरंतर ये जीवन
मनुष्य होना ही जीवन में वरदान बहुत है
धरती पर ही मत ठिठक प्राणी
उड़ने को आगे आसमान बहुत है

देख क्षितिज को मत आँहे भर
निर्णय है कठिन पर आसन है डगर
मनु की संतान है तू मत कर कमजोर जिगर
क्षितिज के आगे ज़हान बहुत है
पंख लगा दे अपनी सोच को तू
उड़ने को आगे आसमान बहुत है

कॉपीराइट रमन शुक्ला :)

Wednesday, September 16, 2009

चन्द ख्याल

वो मुझसे चाहता वही हैं
जो मेरे बस में नही है
दिन की तपिश है मुझमे
उसे सितारों का सुकून चाहिए
मै खुदा नही हूँ मोहतर्मा
इतना भी न आजमाईये
दूरी से इस ऐतराज़ नही
बस मुझे ये बेरुखी नही गँवारा
इस फासले को इतना न बढाईये
की सुनाई न दे जो मैंने पुकारा

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...