की कितना पूछा था तुमने काश हमने बता दिया होता
इतने भी कमज़ोर ना था , काश जता दिया होता
सामने पड़ के भी तुम्हारे यूँ ना चुरानी पड़ती नज़रें
जो बदला हमने भी वफ़ा का वफ़ा दिया होता
हमे भी दिखती की कितनी बेदाग थी तुम्हारी वो कोशिशें
जो हमने अपनी नज़रों से गैरों के नज़रिए का परदा हटा दिया होता
की मारूफ़ थे किस्से तेरे मेरी गलियों से दिनो - रात गुज़रने के
ये किस्से हम दोनो के होते जो लिहाज़ हमने अपनो का मिटा दिया होता
हमारी भी कहानी मे सुलझे हुए दो किरदार होते
जो हमने कभी किताब मे आज तलक रखा गुलाब भिजवा दिया होता
इतने भी कमज़ोर ना था , काश जता दिया होता
सामने पड़ के भी तुम्हारे यूँ ना चुरानी पड़ती नज़रें
जो बदला हमने भी वफ़ा का वफ़ा दिया होता
हमे भी दिखती की कितनी बेदाग थी तुम्हारी वो कोशिशें
जो हमने अपनी नज़रों से गैरों के नज़रिए का परदा हटा दिया होता
की मारूफ़ थे किस्से तेरे मेरी गलियों से दिनो - रात गुज़रने के
ये किस्से हम दोनो के होते जो लिहाज़ हमने अपनो का मिटा दिया होता
हमारी भी कहानी मे सुलझे हुए दो किरदार होते
जो हमने कभी किताब मे आज तलक रखा गुलाब भिजवा दिया होता