Monday, April 6, 2015

Aaaah!!!

अब्द कहो या आशिक़
 हम को इबादत ही करनी है
फ़र्क तो तब भी ना होगा
जब काफ़िर कहे जाएँगे


एहतमाम जबरद्श्त थे माहौले ए वश्ल के हमारे
 लेकिन एक बार और आपकी याद ही आई थी तन्हा बारात मे
माँगने को तो जमाना माँग लिया था हमने
 पर खुदा ने तो एक मुलाक़ात भी ना बख़्शी हमे जायदाद मे

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...