यंहा कुछ नर और और कुछ नारी हैं
कुछ हैं अफसर और कुछ भिखारी हैं
कुछ कुकुर और बिलारी हैं
कुछ शंकर हैं कुछ अंसारी हैं
एक इस धरती पे बसी ये बस्ती सारी है
कुछ न जाने किस किस का दंभ भरते हैं
कुछ अपने में ही जिया करते हैं
है आना जाना रीति यंहा की
न जाने कितने पैदा होते और कितने मरते हैं
अंधी दौड़ मची हैं यंहा पर
कितने ही उठते और गिरते हैं
धर्म और नस्लवाद की खाई यंहा पे
लाशों से पाटी जाती है
अच्छाई, न्याय, इज्ज़त यंहा
भरी जेब को बांटी जाती है
अपमान, अन्याय और बुराई
सिर्फ़ गरीब के हिस्से आती है
वसुधैव कुटुम्बकम तो सिर्फ़ इतिहास की बातें है
चारो तरफ़ तो सिर्फ़ अलगाववादी ही नज़र आते हैं
खो गए वो सफ़ेद कबूतर कही
अब तो शिकारी भेडिये ही दिख जाते हैं
चोरों का पहनावा है खद्दर
या खद्दर पहन के चोर बन जाते हैं
ऐसी भी कैसी भूख है ये आजिम
छीन दूसरों का निवाला ये खाते हैं
कहते थे नेहरू अब आराम नही
क्या करे डिग्री है पर काम नही
इंतज़ार उम्मीद और अपेक्षाओं का ये दौर नही
दम घुटता है मेरा बस करो अब और नही
आओ कुछ तो इसका समाधान करें
क्यूँ न महाभारत सा एक घमासान करें
एक बार फ़िर से इस गुलशन को आजाद कराते हैं
फ़िर से सपनों का पाने एक हिन्दुस्तान बनाते हैं
Copyright 2009 © Raman Shukla "Azim" :)
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Sunday, August 30, 2009
Friday, August 28, 2009
मोहब्बत किशमिश से छुहारा न हुई
अभी कल की ही बात है सोशल नेट्वर्किंग साईट ऑरकुट पे मैंने किसी दोस्त को ये शेर लिख के भेजा
तुम्हे वो बचपन सी मोहब्बत दुबारा न हुई !!
तुम्हे वो बचपन सी मुहब्बत दुबारा न हुई ,
कुछ यूँ नज़र लगी तुम्हारी अशिय्नाए को मेरी
की कभी फिर तुम्हारी मोहब्बत किशमिश से छुहारा न हुई
और शीघ्र ही मुझे एक अन्य मित्र से निचे लिखा extension मिला
अगर हो जाती मोहब्बत किसमिस से छुहारा ...
तो यूँ ही ना घूमते आवारा ....
कसम आशियाने की , वहां आग लगाना ही बेहतर था ...
हमें जो चाहिए था , उनसे छुटकारा ....
वास्तव में जब मैंने दोनों को जोड़कर पढ़ा तो काफी देर तक मै मन ही मन मुस्कुराता रहा, basically मेरा कुछ ७-८ मित्रों का समूह है जो की आपस में कई समानताएं रखते हैं जिसमे से मजोर समानता है की हममे से किसी की गर्लफ्रेंड नही है :) अगर गौर से देखा जाए तो इसकी वजह एक ही है की जब तक वो आती नही है तब तक हम रोते हैं की आती नही है और जब गलती से कभी आ जाती है तो रोते हैं की कम्बखत जाती नही है
तुम्हे वो बचपन सी मोहब्बत दुबारा न हुई !!
तुम्हे वो बचपन सी मुहब्बत दुबारा न हुई ,
कुछ यूँ नज़र लगी तुम्हारी अशिय्नाए को मेरी
की कभी फिर तुम्हारी मोहब्बत किशमिश से छुहारा न हुई
और शीघ्र ही मुझे एक अन्य मित्र से निचे लिखा extension मिला
अगर हो जाती मोहब्बत किसमिस से छुहारा ...
तो यूँ ही ना घूमते आवारा ....
कसम आशियाने की , वहां आग लगाना ही बेहतर था ...
हमें जो चाहिए था , उनसे छुटकारा ....
वास्तव में जब मैंने दोनों को जोड़कर पढ़ा तो काफी देर तक मै मन ही मन मुस्कुराता रहा, basically मेरा कुछ ७-८ मित्रों का समूह है जो की आपस में कई समानताएं रखते हैं जिसमे से मजोर समानता है की हममे से किसी की गर्लफ्रेंड नही है :) अगर गौर से देखा जाए तो इसकी वजह एक ही है की जब तक वो आती नही है तब तक हम रोते हैं की आती नही है और जब गलती से कभी आ जाती है तो रोते हैं की कम्बखत जाती नही है
ये दौलत भी ले लो ये शौहरत भी ले लो भले छीन लो मेरी जवानी मगर लौटा दो मुझको मेरा वो बचपन वो बारिश का पानी
क्या मस्त मौसम हो रखा है बाहर आज काफी दिनों बाद अहमदाबाद में बारिश हुई है और बस इस सुहाने मौसम के चलते बिना कोई नशा किए और गजल सुने हम nostalgic हो रहे हैं। इसी अवस्था के चलते हम कुछ पुरानी या यूँ कहे की बचपन की यादों में खो गए, साला क्या लाइफ हुआ करती थी कक्षा १ से लेकर १० तक same रूटीन सुबह उठना डाट खाते हुए स्कूल के लिए तैयार होना फ़िर वो शाही स्कूल वाहन डब्बे वाला रिक्शा पे चढ़ के स्कूल जाना वहाँ मुर्गा बने तो ठीक न बने तो बहुत अच्छा फ़िर अपने और दूसरों के टिफिन से लंच तक खा पीकर बराबर कर देना लंच को स्पोर्ट्स पीरियड की तरह इस्तेमाल करना फ़िर छुट्टी का इंतज़ार करना और वहस अपने शाही वाहन पे सवार हो के वापस आ जाना। शाम को होमवर्क निपटाना, रात का खाना खाना और सो जाना। अगर macroscopic लेवल पे देखा जाए तो यही दिनचर्या थी पर माइक्रोस्कोपिक लेवल पे देखा जाए तो सायद हम भी ३-४ पुराण तो अपनी लाइफ पे भी लिख सकते हैं :) तो actually में हम बात कर रहे थे nostalgic होने की और उसी अवस्था में बिज़ली की तरह एक प्रश्न हमारे मन में कौंधा की क्यूँ घर से इतनी दूर बैठे हैं? तुंरत अंतरात्मा ने जवाब दिया "अपने सपने पूरे करने के लिए " मन बड़ा ही हाजिरजवाब था उसने तुंरत पुछा की "ये सपने दिखाए किसने?" हम्म अबकी अंतरात्मा सोचने पे विवश हो गई की आख़िर इस सवाल का जवाब क्या है? इसे जानने के लिए फ़िर उसे मेरे बचपन में झांकना पड़ा तो याद आया वो बचपन में बड़ी गाड़ियों के पोस्टर्स जिन्हें देख के लगता था की कब ये हमारी होंगी , पापा से bike के लिए जिद्द करना तो उनका कहना बड़े होके अपनी कमाई से खरीदना अभी इससे साईकिल से काम चलाओ , किसी स्पेसिफिक डे पे मिन्नतें करके पापा की गाड़ी मांगना, पापा के स्कूटर पे बैठी गर्लफ्रेंड का किसी दूसरी की bike या कार देख के कंधे से हाथ हटा लेना !!! इन सबने दिखाए थे वो सपने जिन्हें पूरे करने के लिए आज हम उनसे दूर बैठे हिं जिनके लिए ये सपने देखे थे है न कमाल की बात। उससे भी कमल की बात है किजब हम बचपन में सोचते थे की जब पैसे आयेंगे तो ये करेंगे वो करेंगे इत्यादी और जब आज पैसे है तो उनमे से कुछ नही कर रहे न ढेर सारी चॉकलेट खरीद के खा पाते हैं और नही ढेर सारी कॉमिक्स खरीद के पढ़ पाते हैं / अच्छे तो वो बचपन के दिन जब न ये अंतरात्मा थी न पैसे थे थे तो सिर्फ़ मन के आकाश में कल्पना के बादलों से बनते और बिखरते सपने जो किसी भी पोस्टर , मूवी या न्यूज़ को देख के बदलते रहते थे। सायद इसीलिए जगजीत भाई कह गए हैं "ये दौलत भी ले लो ये शौहरत भी ले लो भले छीन लो मेरी जवानी मगर लौटा दो मुझको मेरा वो बचपन वो बारिश का पानी "
Wednesday, August 26, 2009
हम लोग सब विभाजित व्यक्तित्व (स्पिलिट पर्सनालिटी) के हैं
आज अचानक काफी दिनों के बाद हिन्दी में लिखने का मन किया (ब्लॉग में वैसे मई अपनी कवितायेँ हिन्दी में ही लिखता हूँ )। गत एक वर्ष से मै अहमदाबाद में ठिकाना बना के बैठा हूँ , यद्यपि मै अपनी विचरण प्रवत्ति के चलते और कुछ काम के चक्कर में काफी समय अहमदाबाद के बहार भी बिता चुका हूँ, चूँकि अहमदाबाद में मै जादा लोगों को जनता नही कहने का मतलब की मेरे ऑफिस के लोगो को छोड़कर मेरा कही और उठाना बैठना नही है , ऐसे में मै अक्सर दिन के काम के ख़तम होने के बाद या फ़िर काम के बीच में ही अपने बंगलोर और हैदराबाद के मित्रो को दूरभाष यन्त्र के मध्यम से परेशां करता रहता हूँ वैसे तो युग सूचना तकिनिकी का है और गूगल टॉक , याहू messanger जैसे अन्य कई साधन उपलब्ध है परन्तु अपने प्रियजनों से जब तक मोबाइल पे बात न हो मजा नही आता है, क्या कर सकते हैं आदत से मजबूर हैं कानपूर के हैं दिन में जब तक थोडी बकर न करो जीवन सूना सूना सा लगता है । अचानक आज हम सोचने बैठे की हम बिना किसी से बात किए क्यूँ नही रह पते तो पता चला की मै/हम लोग सब विभाजित व्यक्तित्व (स्पिलिट पर्सनालिटी) के हैं , हमें सबकी याद तभी आती है जब या तो वो संकट में होते हिं या हम संकट में होते हैं या फ़िर वो खुश होते हैं या हम भी खुश होते हैं जिअसे की जब हमें दक्षिण भारत का वो हिस्सा छोड़ के आना था तो हम मनमौजी बने बिना किसी की परवाह किए चले आए वास्तव में देखा जाए तो ये हमारा क्रूर व्यवहार था और आज जब हमसे यंहा अहमदाबाद में कोई शाम को गप्पे मरने के लिए नही मिलता तो हम पुनः उसी हिस्से में बसे लोगो से १ रुपये प्रति मिनट की दर पे फ़ोन पे बतियाते हैं जो परिस्थितिवश करुणा का परिचायक है!! तो इस हिसाब से तो हम हुए विभाजित वक्तित्व के स्वामी :) और मै तो मानता हूँ के मेरे संपूर्ण फ्रेंड सर्कल में यही माहौल है सभी ही ऐसा करते हैं और जो ऐसा नहीकारते सायद वो फ्रेंड सर्कल का हिस्सा नही हैं एनी वे सायद कुछ जादा मन कर रहा था इसलिए कुछ भी आन्गड़ बांगड़ लिख दिया हिन्दी में !!!
हम भी क्या बौड़म हैं यार!
हम भी क्या बौड़म हैं यार!
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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मेरे दिल में बसा कोई ख्वाब हँसा तो लगा की ये दिन ख़ास है मुस्कुरा के सुबह जो यूँ धरती पे आई जैसे सुहानी सी सौगात है जब जमीं पे पड़ी वो पानी ...
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सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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गुजर जाओ यहा से तो कभी लौट के भी आना है तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ यह बताने के लिए और तुम हो की डर से सिमाटते जा रहे हो खुद को मुझ...