Sunday, August 15, 2010

आज़ादी

देखो हर तरफ लहरा रहा
तिरंगा फिर से सर उठा रहा
हर साल की तरह फिर एक
ये देश आज़ादी मना रहा
दिखावे में हम झूल गए हैं
शायद मतलब आज़ादी का भूल गए हैं
कही प्रतिज्ञा वंश और इक्छा
commercially आज़ादी मना रहे
तो कही ५० प्रतिशत भारतीय
ड्राई डे होने का अफ़सोस जता रहे
सन ४७ का एक देश आज
कई देशों में टूटने को तैयार है
कल जो सबका हिन्दुस्तान था
आज ठाकरे का महाराष्ट्र और लालू का बिहार है
छुप गया है मतलब आज़ादी का एक ओट में
सब मगन है आज मधुशाला वोते और नोट में
खेल लो आज और एक दांव और
आज़ादी को दिल से मना के देखो
एक बार तिरंगे को उन शहीदों की तरह फहरा के देखो

Friday, August 13, 2010

शायद

पीने से मिलती फुरसत तो शायद
मै भी मधुशाला लिख पाता
पारो नहीं चंद्रमुखी ही मिल जाती तो शायद
मै भी देवदास बन जाता
बच्चन नहीं वचन चाहिए थे
हाल - ए - मधुशाला लिखने को
पारो ही नहीं एक दोस्त चुन्नी सा
भी चाहिए था देवदास सा दिखने को
हाला से ये हाल हुआ की डगमग
डगमग अब ये पग पड़ते हैं
हाल के हाल से बचता तो दो
चार कदम सीधे चल पाता
पीने से मिलती फुरसत तो शायद
मै भी मधुशाला लिख पाता

कॉपीराइट रमन शुक्ला :)

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...