Wednesday, August 19, 2015

आख़िरी शब्द .......

गर्द सी जमने लगी है फिर वहाँ रखी किताबों मे....
 उस कमरे मे फिर जाले लग गये हैं
अब हवाला मत दो अज़ीम हमे उन कमरों का
 जिनमे अब ताले लग गये हैं

ताले लग गये हैं और उनकी चाभी हमारे पास नही है
गुज़र जाने दो ये लम्हे और इनसे लिपटी ख्वाहिसे
इनका हिसाब रखना अब हमारे बस की बात नही है

नही बिकना हमे अब बढ़ी कीमतों के बाज़ार मे
क्यूंकी दाम इनमे हमारे पुराने वाले लग गये हैं
अब हवाला मत दो अज़ीम हमे उन कमरों का
 जिनमे अब ताले लग गये हैं ..... रमन शुक्ला

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...