सुबह से शाम से मिलता हूँ कन्स कुम्भकरण और रावण से
पर कही ना कही जहन मे मिलते हैं राम भी
दिन गुज़ार देता हूँ मुफ़लिसी और बेबसियों मे
फिर भी जहन मे मिलते हैं करने को कुछ काम भी
दूर रहते हैं कितने भी तुम हमसे और हम तुमसे
फिर भी अपना ऐसा है की जहन मे मिलते हैं हम हर शाम ही