वो पुरानी सकरी गली खो गयी है
वो छोटा छाँव वाला छप्पर ढह गया है
वो कंचे पुरानी फटी जेब से गिर के बिखर गए हैं
जब तलशता हूँ वो यादों का झोला
तो लगता है की पीछे कुछ रह गया है
न जाने कहा छुप गए हैं वो बचपन के दोस्त
पता नहीं किस याद संग वो लकड़ी का बैट बह गया है
अरे यार वो बर्फ के गोले इमली चूरन भी नहीं मिल रहे
खंगाल डाले सारे पुराने बक्से जो संभाल रक्खे थे तब से
थक गया ढूंढ के आजिम कह गया है
यकीं है मुझको की पक्का पीछे कुछ रह गया है
कॉपीराइट रमन शुक्ला :)
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Thursday, April 28, 2011
Wednesday, April 27, 2011
तुम
तुम रह जाते तो सुकून रह जाता
थाम के हाथ तुम्हारा हर गम सह जाता ..
दरिया या समंदर कही भी कश्ती चला देता ..
मरू बंजर में भी फूल खिला देता ..
कुछ और देर रहते तो कुछ कह सुन पाता ..
... कुछ और दिन जीने का जूनून रह जाता ...
तुम रह जाते तो सुकून रह जाता...
कॉपीराइट रमन शुक्ला :)Thursday, April 14, 2011
शेर
आशिकी किसी परदे की गुलाम नहीं ,
हम करते चुप के कभी सलाम नहीं ,
छुपाना कुछ अपनी फितरत नहीं ,
वो इश्क क्या जिसका हो चर्चा सरे आम नहीं
हम करते चुप के कभी सलाम नहीं ,
छुपाना कुछ अपनी फितरत नहीं ,
वो इश्क क्या जिसका हो चर्चा सरे आम नहीं
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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मेरे दिल में बसा कोई ख्वाब हँसा तो लगा की ये दिन ख़ास है मुस्कुरा के सुबह जो यूँ धरती पे आई जैसे सुहानी सी सौगात है जब जमीं पे पड़ी वो पानी ...
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सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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गुजर जाओ यहा से तो कभी लौट के भी आना है तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ यह बताने के लिए और तुम हो की डर से सिमाटते जा रहे हो खुद को मुझ...