Sunday, March 17, 2019

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल मे है


सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल मे है
कहने वाला हर कोई
बाज़ारो घरों और दफ़्तरों के बिल मे है
परेशानी सड़कों पे क़ाबिज़
ख़ौफ़ अब हर तिल तिल मे है
तड़पति इंसानियत ढूँढती मसीहा
झाड़ू कमल और हाथ मे
उसे क्या मालूम की चल रहे  है
साँप आस्तीन के साथ मे
मुल्क और अदालत मे पेश मसौदा
अच्छाइयों के कत्ल का
पाएँगे इंसाफ़ पाक साफ सा
ये अरमान हर नज़र के दिल मे है
मासूमों को क्या मालूम की शामिल
कातिल जिरह करने वालों की महफ़िल मे है
                      कॉपीराइट - रमन शुक्ला  ©

Friday, March 15, 2019

ज़िंदगी सिर्फ़ बिता दी है

जी नही है
बस बिता दी है
पूरी पढ़ी नही
बस नयी किताब की तरह
एक कोने मे लगा दी है
खर्चा नही इसे बस
सहज कर एक गठरी बना दी है
कोरे रह गये सारे काग़ज़
सारी बातें मौखिक ही बता दी हैं
ना जाने क्या सन्चय करने मे
की संचित समय की बर्बादी है
हा ना की गुलामी करते
भूली अपनी आज़ादी है
ज़िंदगी बस ज़ी नही है
सिर्फ़ बिता दी है

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...