ध्येय एक विश्वास एक
मन में बसी बस आस एक
तू भी अर्जुन बन जाएगा
बस पंछी की तू आँख देख
कर कठोर प्रयास तू
नित कर मगन अभ्यास तू
ह्रदय को ही गुरु तू मान ले
एकलव्य तू ख़ुद को जान ले
संचित जल सरोवर का नही
तुझे नदी का प्रवाह बन जाना है
सूरज के तप को ललकार कर
सागर से तुझको मिल जाना है
साहस , मान , स्वाभिमान से
तरकश में तेरे कई तीर है
अहो क्या और सौभाग्य हो
रण आहुति हेतु निज संपूर्ण शरीर है
सामान्य से संसार में
कुछ असामान्य तुझे कर जाना है
बहुत बड़ा है ये कारवां
उसमे स्थान विशिष्ट तुझे पाना है
इतिहास स्मरण मात्र नही करना अब
हमको इतिहास पुरूष बन जाना है
अभी आग ह्रदय में बाकि है
इतिहास अब हमको ही दोहराना है -२
copyright Raman Shukla
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Sunday, September 20, 2009
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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