Sunday, September 20, 2009

साहस

ध्येय एक विश्वास एक
मन में बसी बस आस एक
तू भी अर्जुन बन जाएगा
बस पंछी की तू आँख देख

कर कठोर प्रयास तू
नित कर मगन अभ्यास तू
ह्रदय को ही गुरु तू मान ले
एकलव्य तू ख़ुद को जान ले

संचित जल सरोवर का नही
तुझे नदी का प्रवाह बन जाना है
सूरज के तप को ललकार कर
सागर से तुझको मिल जाना है

साहस , मान , स्वाभिमान से
तरकश में तेरे कई तीर है
अहो क्या और सौभाग्य हो
रण आहुति हेतु निज संपूर्ण शरीर है

सामान्य से संसार में
कुछ असामान्य तुझे कर जाना है
बहुत बड़ा है ये कारवां
उसमे स्थान विशिष्ट तुझे पाना है

इतिहास स्मरण मात्र नही करना अब
हमको इतिहास पुरूष बन जाना है
अभी आग ह्रदय में बाकि है
इतिहास अब हमको ही दोहराना है -२

copyright Raman Shukla

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