क्यूँ करता व्यर्थ इस जीवन को
क्यूँ तुझे पर - निर्णय पे अभिमान बहुत है
एक तेरा निर्णय ही लायेगा परिवर्तन
परिवर्तन में ही है निरंतर ये जीवन
मनुष्य होना ही जीवन में वरदान बहुत है
धरती पर ही मत ठिठक प्राणी
उड़ने को आगे आसमान बहुत है
देख क्षितिज को मत आँहे भर
निर्णय है कठिन पर आसन है डगर
मनु की संतान है तू मत कर कमजोर जिगर
क्षितिज के आगे ज़हान बहुत है
पंख लगा दे अपनी सोच को तू
उड़ने को आगे आसमान बहुत है
कॉपीराइट रमन शुक्ला :)
2 comments:
Wah kya khyal hain...
Bahut sahi kaha...
Well written dear.. truly inspiring poem.. I like it.
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