Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Sunday, September 20, 2009
और शाम हो रही है ........
हम यंहा अहमदाबाद में बैठे है रविवार का दिन है तो अपने ऑफिस की खिड़की (विंडो word बड़ा ही माइक्रोसॉफ्ट टाइप लगता है.... है ना !! )से दिन ढलते हुए देख रहे हैं , अँधेरा तेज़ी से उसी तरह से बढ़ रहा है जिस तेज़ी से हमारे देश की आबादी... वैसे भी इतवार ग्लोबल छुट्टी होता है तो दिन भर लोग घर में hibernation के बाद अपने अपने घरों से रौशनी प्रिय पतंगों के माफिक रौशनी और भीड़ से चकाचौंध मॉल्स और मल्टीप्लेक्सेस की तरफ़ मुखातिब हो रहे हैं । उन सभी की पत्नियाँ खुश हैं की बहर जा रहे हैं वही से कुछ खा के आयेंगे आज तो कम से कम किचेन से छुटकारा मिला। किसी किसी घर से आरती की आवाज आ रही है (ग़लत न समझियेगा ये भगवान् की प्रार्थना के बारे में था अपार्टमेन्ट की किसी लड़की का नाम नही ) शायद नवरात्री के चलते । दिन भर के अलसाये कुत्ते लोट पोट करके नाईट शिफ्ट के लिए उसी तरह तैयार हो रहे हैं जिस तरह किसी क्रिकेट मैच से पहले फील्डिंग साइड के प्लयेर्स मैच शुरू होने से पहले वार्म अप होते हैं रोड लाइट बिना किसी क्रम के ऐसे जल रही है जैसे होली का गुलाल मुरलीधरन पे उड़ा दिया हो जहा पड़ा वह चमक रहा है बाकि जगह अँधेरा । वो लोग जो कुंवारे है और बेरोजगार हैं अपनी पसंद की दुकान पे उसी तरह इकठ्ठा हो रहे हैं जैसे सुबह सुबह किसी फूल पे भौंरे एकत्रित होते हैं । अपार्टमेन्ट के वयोवृद्ध नीचे इकठ्ठा हो के विश्व और देश की आर्थिक व्यस्था पे चिंतन करने को एकत्रित हो चुके हैं वैसे भी व्यक्ति चिंतन उसी विषय पे करता है जिसके कार्यान्वन पे उसका कोई बस नही चलता। चिंतन की शुरुआत ही कार्य के असफल या आउट ऑफ़ कंट्रोल हो जाने पे ही होती है। अगर हम चाहे तो यंहा पर चिंतन और कार्यान्वन के सही क्रम को लेके एक विस्तृत विवेचना कर सकते हैं पर अभी समय उपयुक्त नही है । अरे वो देखिये ६-७ खिलाड़ियों का क समूह हाथ में क्रिकेट बैट एवं गेंद वगैरह लिए चला आरहा है सर झुके हुए हैं अर्थात हार के आ रहे हैं पर सीखना इनसे भी चाहिए आज हार गए तो आज ही क्रिकेट छोड़ नही देंगे कल फ़िर खेलने जायेंगे और किसी न किसी दिन जीतेंगे और फ़िर खेलने जायेंगे । मच्छर अपने अपने गुप्त ठिकानो से निकल कर रात्रि कालीन गोरिल्ला आक्रमण के लिए तैयार हो रहे हैं । अवश्य ही बुढ्ढे मच्छर युवक मच्छरों को "वीर तुम बढे चलो धीर तुम बढे चलो " जैसे गीत गा कर उत्साहित कर रहे होंगे और युवा मच्छर इन गीतों से बेपरवाह आपस में सलाह कर रहे होंगे की किस किस युवक और युवती का रक्त पान करना है as per their own taste as 377 is allowed. अरे हम जमीन पे इतना केंद्रित हो गए की असमान पे विचरण करने वाले इन पंक्षियों का तो हमें ध्यान ही नही रहा आईये उन्हें भबी देख लेते हैं चिडियां किसी कॉन्वेंट स्कूल के स्टूडेंट्स की तरह समूह में अपने घरों की तरफ़ चली जा रही हैं और कौवे किसी सरकारी स्कूल के लफ्फाजों की तरह से इस डाल से उस डाल पे कूदते हुए शाम के भोजन के लिए फाइट मार रहे हैं। बस अब तो शाम ख़तम भी हो गई रात का अँधेरा गहराने लगा है ....
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
5 comments:
gud one ,kafi analysis kiya, aaj kaam nahi tha kya :P
bachpan main agar itna achcha essay likhte to kasam se 100 number milte HINDI main ...
andhera agar abadi ki tareh badh raha hai, to iska matlab ummed abhi baki hai ...matlab subah aayegi ...
Bahut hee badia likhe ho guru dev ...yeah lekhan kisee kitaab main publish hona chahiye ...
Bhai tumahri expressing power hindi mein ultimate hain.. jaldi hi koi book wook likho to maja jaaye dost.. sala life mein jiteji ek noval jaroor padhna hai, written by Raman shukla.
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