गौर किया तो लगा दिल की शिकायत सही है
आज कल कलम की हम पे इनायत नहीं है
हुए दूर कागज़ और स्याही से अब हम
कहते हैं लोग बदल मेरी इबादत गयी है
जो थी कल तक कैफियत और जो दस्तूर था
जो जारी कल तक बदस्तूर था
शायद अब वो नियत बदल गयी है
वो था दिन दूसरा जिसकी शाम ढल गयी है
बेमौसम बारिश की किसे प्यास है
पर कुछ बूंदों की तो हमें तलाश है
फिर अब पुरानी स्याही से लिखनी इबारत नयी है
मान लेते हैं वो आरजू जो अपने दिल ने कही है
कॉपीराइट रमन शुक्ला :)
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Wednesday, January 6, 2010
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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गुजर जाओ यहा से तो कभी लौट के भी आना है तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ यह बताने के लिए और तुम हो की डर से सिमाटते जा रहे हो खुद को मुझ...
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