Wednesday, January 6, 2010

दिल की शिकायत

गौर किया तो लगा दिल की शिकायत सही है
आज कल कलम की हम पे इनायत नहीं है
हुए दूर कागज़ और स्याही से अब हम
कहते हैं लोग बदल मेरी इबादत गयी है

जो थी कल तक कैफियत और जो दस्तूर था
जो जारी कल तक बदस्तूर था
शायद अब वो नियत बदल गयी है
वो था दिन दूसरा जिसकी शाम ढल गयी है

बेमौसम बारिश की किसे प्यास है
पर कुछ बूंदों की तो हमें तलाश है
फिर अब पुरानी स्याही से लिखनी इबारत नयी है
मान लेते हैं वो आरजू जो अपने दिल ने कही है

कॉपीराइट रमन शुक्ला :)

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