Saturday, February 20, 2010

सालों कहा चले गए हो ??

सालों कहा चले गए हो
या फिर मै कही दूर निकल आया हूँ
भोर की तलाश में क्षितिज से दूर
जाने किन अंधेरों को साथ लाया हूँ

बहुत याद आती है वो रातों की गप्पें
वो दिन की धमाचौकड़ी
अब नहीं भाती हैं ये सुनसान रातें
और दिन की उलझनें

ऐसा लगता है "र" रह गया है यंहा
और "मन" कही और चला गया है
ऐसी आपाधापी की ज़िन्दगी में
अब बचा क्या भला है

इतने बड़े शरीर पे अब
ये छोटा सा दिल भारी हो गया है
ढूँढ़ते ढूँढ़ते तुम लोगो को
थक कर ये सो गया है

आ जाओ वापस या
मै ही आ पहुँचता हूँ
एक प्याली चाय अब साथ
किसी के पीने को तरसता हूँ

जैसे जैसे वक़्त ये
आगे बढ़ता जा रहा है
जंगल और चिड़ियाघर
का फर्क समझ में आ रहा है


चिड़ियाघर में हो गा आराम ज्यादा
अच्छा खाना और शायद डर नहीं होगा
कितना भी हो खुबसूरत वो मंज़र
मगर अपना घर नहीं होगा

शायद कल नयी सुबह हो और
और फिर तुम में से कोई यंहा न हो
कोशिश जरा सी कर के देखना
शायद हम ख्वाब में फिर से एक बार साथ हों
और इससे बेहतर न दूजा कोई जंहा हो

कॉपीराइट रमन शुक्ला :)

3 comments:

luckygopika said...

kya baat hai itne senti kyu ??

Ravi said...

Lagta hai chai, coffee...etc. ke sath baithna hi padega :P

Anonymous said...

hum yehin hai hum kaha jayenge
thoda uchak ke dekh yehin pass najar ayenge...
dikha??????????...nahi na???
hame bhi "R" aur "MAN" to dikhe lekin "C" najar nahi aya
isi liye humne apana chehara nahi dikhaya....

NICE ONE....

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...