कभी धीमे से कोई कुछ फरमा जाये
कान के पीछे कोई हवा सा आ जाये
सीने से होते हुई वो ऊँगली जो गुजरे बालों से
कभी ठिठक जाये गर्दन से होते हुए गालों पे
तुम्हारे लिए मुझको पागल बनाने को इतना ही काफी है
ऑरकुट फेसबुक ट्विट्टर पे प्रोफाइल फोटो
कभी उसके दिए हुए गुलाब दो ठो
रातों को फ़ोन पे यूँ ही समेट देना
ख्वाबों की लम्बी उड़ान को
एक मुस्कान में लपेट देना
तुम्हारे लिए मुझको पागल बनाने को इतना ही काफी है
3 comments:
:)
where is my on demand poem..
kya baat hai shukla ji..kispe dil aa gaya.. aap to bade chupe rustam nikle..
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