Monday, July 26, 2010

तुम्हारे लिए

कभी धीमे से कोई कुछ फरमा जाये
कान के पीछे कोई हवा सा आ जाये
सीने से होते हुई वो ऊँगली जो गुजरे बालों से
कभी ठिठक जाये गर्दन से होते हुए गालों पे
तुम्हारे लिए मुझको पागल बनाने को इतना ही काफी है
ऑरकुट फेसबुक ट्विट्टर पे प्रोफाइल फोटो
कभी उसके दिए हुए गुलाब दो ठो
रातों को फ़ोन पे यूँ ही समेट देना
ख्वाबों की लम्बी उड़ान को
एक मुस्कान में लपेट देना
तुम्हारे लिए मुझको पागल बनाने को इतना ही काफी है

3 comments:

piya said...

:)

piya said...

where is my on demand poem..

luckygopika said...

kya baat hai shukla ji..kispe dil aa gaya.. aap to bade chupe rustam nikle..

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...