वो पुरानी सकरी गली खो गयी है
वो छोटा छाँव वाला छप्पर ढह गया है
वो कंचे पुरानी फटी जेब से गिर के बिखर गए हैं
जब तलशता हूँ वो यादों का झोला
तो लगता है की पीछे कुछ रह गया है
न जाने कहा छुप गए हैं वो बचपन के दोस्त
पता नहीं किस याद संग वो लकड़ी का बैट बह गया है
अरे यार वो बर्फ के गोले इमली चूरन भी नहीं मिल रहे
खंगाल डाले सारे पुराने बक्से जो संभाल रक्खे थे तब से
थक गया ढूंढ के आजिम कह गया है
यकीं है मुझको की पक्का पीछे कुछ रह गया है
कॉपीराइट रमन शुक्ला :)
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Thursday, April 28, 2011
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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