सरहदों के इस तरफ भी हैं और उस तरफ भी
शहर के मकानों मे भी हैं और गावों के झोपड़ों मे भी
फैले ये संसार मे सारे हैं ये आशिक़ बेचारे हैं
चाय की चुस्कियों के बीच अंगड़ाई लेके
कभी अख़बार पढ़ते हुए पेरिफिरल विजन के सहारे
कभी छोटे कंकड़ों को मारना उसके दरवाजे पे
और कभी पहुच जाना उनके घर पुरानी किताब माँगने
पता नही और कितने तरह से करते ये इशारे हैं
ये सारे आशिक़ बेचारे हैं
छोटी छोटी कहानियों के गुच्छे हैं इनके दिलों मे
यादों मे ही जी लेते हैं
बीते वो लम्हे जो सारे हैं
हक़ीकत मे तो जीते अब बस तस्वीर के सहारे हैं
ये सारे आशिक़ बेचारे हैं
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