अब्द कहो या आशिक़
हम को इबादत ही करनी है
फ़र्क तो तब भी ना होगा
जब काफ़िर कहे जाएँगे
एहतमाम जबरद्श्त थे माहौले ए वश्ल के हमारे
लेकिन एक बार और आपकी याद ही आई थी तन्हा बारात मे
माँगने को तो जमाना माँग लिया था हमने
पर खुदा ने तो एक मुलाक़ात भी ना बख़्शी हमे जायदाद मे
हम को इबादत ही करनी है
फ़र्क तो तब भी ना होगा
जब काफ़िर कहे जाएँगे
एहतमाम जबरद्श्त थे माहौले ए वश्ल के हमारे
लेकिन एक बार और आपकी याद ही आई थी तन्हा बारात मे
माँगने को तो जमाना माँग लिया था हमने
पर खुदा ने तो एक मुलाक़ात भी ना बख़्शी हमे जायदाद मे
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