Tuesday, May 22, 2018

जहन मे


सुबह से शाम से मिलता हूँ कन्स कुम्भकरण और रावण से
पर कही ना कही  जहन  मे मिलते हैं राम भी
दिन गुज़ार देता हूँ मुफ़लिसी और बेबसियों मे
फिर भी जहन मे मिलते हैं करने को कुछ काम भी
दूर रहते हैं कितने भी तुम हमसे और हम तुमसे
 फिर भी अपना ऐसा है की जहन मे मिलते हैं हम हर शाम ही

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वादा है की

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