Friday, March 15, 2019

ज़िंदगी सिर्फ़ बिता दी है

जी नही है
बस बिता दी है
पूरी पढ़ी नही
बस नयी किताब की तरह
एक कोने मे लगा दी है
खर्चा नही इसे बस
सहज कर एक गठरी बना दी है
कोरे रह गये सारे काग़ज़
सारी बातें मौखिक ही बता दी हैं
ना जाने क्या सन्चय करने मे
की संचित समय की बर्बादी है
हा ना की गुलामी करते
भूली अपनी आज़ादी है
ज़िंदगी बस ज़ी नही है
सिर्फ़ बिता दी है

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