महक से अपनी आज वो आवाज़ दे गया है बरसते बरसते
आकर ठहर जाने का अंदाज़ दे गया है वो बरसते बरसते
छेड़ कर छोड़ देना या छोड़ कर छेड़ देना तरीका था उसका
अधूरी रहे उस कहानी को आगाज़ दे गया है बरसते बरसते
मक़बूल थी अदायें और शौक उस सितम-गर के
ख्वाबों को पर-ए- परवाज़ दे गया है वो बरसते बरसते
जरी के काम सा बुन गया ताना बाना रूह पे
पूछता रहे सवाल वो समाज़ दे गया है बरसते बरसते
आकर ठहर जाने का अंदाज़ दे गया है वो बरसते बरसते
छेड़ कर छोड़ देना या छोड़ कर छेड़ देना तरीका था उसका
अधूरी रहे उस कहानी को आगाज़ दे गया है बरसते बरसते
मक़बूल थी अदायें और शौक उस सितम-गर के
ख्वाबों को पर-ए- परवाज़ दे गया है वो बरसते बरसते
जरी के काम सा बुन गया ताना बाना रूह पे
पूछता रहे सवाल वो समाज़ दे गया है बरसते बरसते
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