समझना मुश्किल है तुझे
या मुश्किल है तुझे समझाना
दूर रहना तुझसे मुश्किल है
या मुश्किल है तुझको पास बुलाना
ये दिल तेरा राज़ अजीब
तू मुझको जाने पूरा और
मै तुझसे अनजाना
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Sunday, May 9, 2010
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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मेरे दिल में बसा कोई ख्वाब हँसा तो लगा की ये दिन ख़ास है मुस्कुरा के सुबह जो यूँ धरती पे आई जैसे सुहानी सी सौगात है जब जमीं पे पड़ी वो पानी ...
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सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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गुजर जाओ यहा से तो कभी लौट के भी आना है तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ यह बताने के लिए और तुम हो की डर से सिमाटते जा रहे हो खुद को मुझ...
1 comment:
Ur poems are always good even if its short like this.... where r u these days..almost 2 months since u penned down...
Likho kuch yaara ki hum bhi padh le...tum phone karo zara toh hum thoda jhagad le... :)
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