Tuesday, July 20, 2010

क्या वाकई समय कम है मेरे पास

अहमदाबाद छोड़े हुए २ महीने ७ दिन हो गए हैं। देखा जाये तो इतने समय में बहुत कुछ बदल गया है , काफी कुछ आगे आने को पड़ा है और शायद उससे कही ज्यादा पीछे छूट गया है। वंहा एक के साथ रहता था था और एक मुझसे नफरत करता था और यंहा एक के साथ रहता हूँ और एक से नफरत करता हूँ । खैर सबसे जरुरी बात की इतने दिन में कुछ लिखने का मौका भी नहीं मिला तो पेश हैं चार पंक्तियाँ , प्रस्तुतकर्ता पुराना संत :

कही कुछ भूल जाता हूँ
तो कही कुछ याद रह जाता है
जिससे चाहूँ रहना दूर
वही रह रह के पास आता है
छोड़ आया जिसे घूँट समझ कर
बन के समंदर मुझ प्यासे को तरसाता है
बिना पतवार के रेत पे ये कश्ती
तलाशती है अपने माझी को
पर सूखे किनारों पे भी कहा कोई कभी आता है

3 comments:

piya said...

oo sukhe kinare... woh Ahmadabad wala jo tumse nafrat karta tha uske liye poem likhi...wah wah

luckygopika said...

beautiful..but ahemdabad mein aapse kaun nafrat karta tha..bataya nahi kabhi aapne..kisko PJs sunaye the :P

Unknown said...

kisse nafrat karte ho bhyee ...par likhte accha ho

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...