अहमदाबाद छोड़े हुए २ महीने ७ दिन हो गए हैं। देखा जाये तो इतने समय में बहुत कुछ बदल गया है , काफी कुछ आगे आने को पड़ा है और शायद उससे कही ज्यादा पीछे छूट गया है। वंहा एक के साथ रहता था था और एक मुझसे नफरत करता था और यंहा एक के साथ रहता हूँ और एक से नफरत करता हूँ । खैर सबसे जरुरी बात की इतने दिन में कुछ लिखने का मौका भी नहीं मिला तो पेश हैं चार पंक्तियाँ , प्रस्तुतकर्ता पुराना संत :
कही कुछ भूल जाता हूँ
तो कही कुछ याद रह जाता है
जिससे चाहूँ रहना दूर
वही रह रह के पास आता है
छोड़ आया जिसे घूँट समझ कर
बन के समंदर मुझ प्यासे को तरसाता है
बिना पतवार के रेत पे ये कश्ती
तलाशती है अपने माझी को
पर सूखे किनारों पे भी कहा कोई कभी आता है
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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मेरे दिल में बसा कोई ख्वाब हँसा तो लगा की ये दिन ख़ास है मुस्कुरा के सुबह जो यूँ धरती पे आई जैसे सुहानी सी सौगात है जब जमीं पे पड़ी वो पानी ...
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सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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गुजर जाओ यहा से तो कभी लौट के भी आना है तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ यह बताने के लिए और तुम हो की डर से सिमाटते जा रहे हो खुद को मुझ...
3 comments:
oo sukhe kinare... woh Ahmadabad wala jo tumse nafrat karta tha uske liye poem likhi...wah wah
beautiful..but ahemdabad mein aapse kaun nafrat karta tha..bataya nahi kabhi aapne..kisko PJs sunaye the :P
kisse nafrat karte ho bhyee ...par likhte accha ho
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