देखो हर तरफ लहरा रहा
तिरंगा फिर से सर उठा रहा
हर साल की तरह फिर एक
ये देश आज़ादी मना रहा
दिखावे में हम झूल गए हैं
शायद मतलब आज़ादी का भूल गए हैं
कही प्रतिज्ञा वंश और इक्छा
commercially आज़ादी मना रहे
तो कही ५० प्रतिशत भारतीय
ड्राई डे होने का अफ़सोस जता रहे
सन ४७ का एक देश आज
कई देशों में टूटने को तैयार है
कल जो सबका हिन्दुस्तान था
आज ठाकरे का महाराष्ट्र और लालू का बिहार है
छुप गया है मतलब आज़ादी का एक ओट में
सब मगन है आज मधुशाला वोते और नोट में
खेल लो आज और एक दांव और
आज़ादी को दिल से मना के देखो
एक बार तिरंगे को उन शहीदों की तरह फहरा के देखो
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Sunday, August 15, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
-
मेरे दिल में बसा कोई ख्वाब हँसा तो लगा की ये दिन ख़ास है मुस्कुरा के सुबह जो यूँ धरती पे आई जैसे सुहानी सी सौगात है जब जमीं पे पड़ी वो पानी ...
-
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
-
गुजर जाओ यहा से तो कभी लौट के भी आना है तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ यह बताने के लिए और तुम हो की डर से सिमाटते जा रहे हो खुद को मुझ...
No comments:
Post a Comment