पीने से मिलती फुरसत तो शायद
मै भी मधुशाला लिख पाता
पारो नहीं चंद्रमुखी ही मिल जाती तो शायद
मै भी देवदास बन जाता
बच्चन नहीं वचन चाहिए थे
हाल - ए - मधुशाला लिखने को
पारो ही नहीं एक दोस्त चुन्नी सा
भी चाहिए था देवदास सा दिखने को
हाला से ये हाल हुआ की डगमग
डगमग अब ये पग पड़ते हैं
हाल के हाल से बचता तो दो
चार कदम सीधे चल पाता
पीने से मिलती फुरसत तो शायद
मै भी मधुशाला लिख पाता
कॉपीराइट रमन शुक्ला :)
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Friday, August 13, 2010
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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मेरे दिल में बसा कोई ख्वाब हँसा तो लगा की ये दिन ख़ास है मुस्कुरा के सुबह जो यूँ धरती पे आई जैसे सुहानी सी सौगात है जब जमीं पे पड़ी वो पानी ...
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गुजर जाओ यहा से तो कभी लौट के भी आना है तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ यह बताने के लिए और तुम हो की डर से सिमाटते जा रहे हो खुद को मुझ...
1 comment:
achhi hai par bina piye likho to aur achha hai
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