Friday, August 13, 2010

शायद

पीने से मिलती फुरसत तो शायद
मै भी मधुशाला लिख पाता
पारो नहीं चंद्रमुखी ही मिल जाती तो शायद
मै भी देवदास बन जाता
बच्चन नहीं वचन चाहिए थे
हाल - ए - मधुशाला लिखने को
पारो ही नहीं एक दोस्त चुन्नी सा
भी चाहिए था देवदास सा दिखने को
हाला से ये हाल हुआ की डगमग
डगमग अब ये पग पड़ते हैं
हाल के हाल से बचता तो दो
चार कदम सीधे चल पाता
पीने से मिलती फुरसत तो शायद
मै भी मधुशाला लिख पाता

कॉपीराइट रमन शुक्ला :)

1 comment:

luckygopika said...

achhi hai par bina piye likho to aur achha hai

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...