Friday, April 13, 2018

माँ और बेटी

किल्कारी भर के कल ही तो तुम आई थी,
इतनी भी पुरानी बात नही जब तुम मुझमे समाई थी
इन यादों के तुम भूल भी जाओ
ना भूलना नित नयी यादें बनाना
बड़े होके बस थोड़ी मुझ सी हो जाना थोड़ी खुद सी हो जाना

रात सबेरे का ज्ञान नही, बस मर्ज़ी से जग जाती हो
हाँ तुम ही हो मुझसे ये शायद समझाती हो
वक़्त बेवक़्त का हिसाब नही बस देख मुझे इठलाती हो
लगा के उर से जब थपकी दूं तो शांत भाव से सो जाना
बड़े होके  बस थोड़ी मुझ सी हो जाना थोड़ी खुद सी हो जाना

मानव मानव मे भेद नही बस सबकी अंक मे छुप जाती हो
स्थिर अस्थिर कर देती हो
जब बस तुतला के  माँ बोल बुलाती हो
अंक और अक्षर लगते एक जैसे बस रंगों का भेद है जाना
बड़े होके  बस थोड़ी मुझ सी हो जाना थोड़ी खुद सी हो जाना

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वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...