Thursday, July 12, 2018

यादें

मयस्सर नही यादें घाव  देने वालों की
  बस मौजूद है उनकी जो सुकून बसा गये
फेहरिस्त बहुत लंबी थी रुलाने वालों की
 अब शाम की चाय पे वो याद आते हैं जो कभी हॅसा गये 

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वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...