आज अचानक काफी दिनों के बाद हिन्दी में लिखने का मन किया (ब्लॉग में वैसे मई अपनी कवितायेँ हिन्दी में ही लिखता हूँ )। गत एक वर्ष से मै अहमदाबाद में ठिकाना बना के बैठा हूँ , यद्यपि मै अपनी विचरण प्रवत्ति के चलते और कुछ काम के चक्कर में काफी समय अहमदाबाद के बहार भी बिता चुका हूँ, चूँकि अहमदाबाद में मै जादा लोगों को जनता नही कहने का मतलब की मेरे ऑफिस के लोगो को छोड़कर मेरा कही और उठाना बैठना नही है , ऐसे में मै अक्सर दिन के काम के ख़तम होने के बाद या फ़िर काम के बीच में ही अपने बंगलोर और हैदराबाद के मित्रो को दूरभाष यन्त्र के मध्यम से परेशां करता रहता हूँ वैसे तो युग सूचना तकिनिकी का है और गूगल टॉक , याहू messanger जैसे अन्य कई साधन उपलब्ध है परन्तु अपने प्रियजनों से जब तक मोबाइल पे बात न हो मजा नही आता है, क्या कर सकते हैं आदत से मजबूर हैं कानपूर के हैं दिन में जब तक थोडी बकर न करो जीवन सूना सूना सा लगता है । अचानक आज हम सोचने बैठे की हम बिना किसी से बात किए क्यूँ नही रह पते तो पता चला की मै/हम लोग सब विभाजित व्यक्तित्व (स्पिलिट पर्सनालिटी) के हैं , हमें सबकी याद तभी आती है जब या तो वो संकट में होते हिं या हम संकट में होते हैं या फ़िर वो खुश होते हैं या हम भी खुश होते हैं जिअसे की जब हमें दक्षिण भारत का वो हिस्सा छोड़ के आना था तो हम मनमौजी बने बिना किसी की परवाह किए चले आए वास्तव में देखा जाए तो ये हमारा क्रूर व्यवहार था और आज जब हमसे यंहा अहमदाबाद में कोई शाम को गप्पे मरने के लिए नही मिलता तो हम पुनः उसी हिस्से में बसे लोगो से १ रुपये प्रति मिनट की दर पे फ़ोन पे बतियाते हैं जो परिस्थितिवश करुणा का परिचायक है!! तो इस हिसाब से तो हम हुए विभाजित वक्तित्व के स्वामी :) और मै तो मानता हूँ के मेरे संपूर्ण फ्रेंड सर्कल में यही माहौल है सभी ही ऐसा करते हैं और जो ऐसा नहीकारते सायद वो फ्रेंड सर्कल का हिस्सा नही हैं एनी वे सायद कुछ जादा मन कर रहा था इसलिए कुछ भी आन्गड़ बांगड़ लिख दिया हिन्दी में !!!
हम भी क्या बौड़म हैं यार!
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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मेरे दिल में बसा कोई ख्वाब हँसा तो लगा की ये दिन ख़ास है मुस्कुरा के सुबह जो यूँ धरती पे आई जैसे सुहानी सी सौगात है जब जमीं पे पड़ी वो पानी ...
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गुजर जाओ यहा से तो कभी लौट के भी आना है तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ यह बताने के लिए और तुम हो की डर से सिमाटते जा रहे हो खुद को मुझ...
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