Sunday, August 30, 2009

YMI (ये मेरा इंडिया)

यंहा कुछ नर और और कुछ नारी हैं
कुछ हैं अफसर और कुछ भिखारी हैं
कुछ कुकुर और बिलारी हैं
कुछ शंकर हैं कुछ अंसारी हैं
एक इस धरती पे बसी ये बस्ती सारी है
कुछ न जाने किस किस का दंभ भरते हैं
कुछ अपने में ही जिया करते हैं
है आना जाना रीति यंहा की
न जाने कितने पैदा होते और कितने मरते हैं
अंधी दौड़ मची हैं यंहा पर
कितने ही उठते और गिरते हैं
धर्म और नस्लवाद की खाई यंहा पे
लाशों से पाटी जाती है
अच्छाई, न्याय, इज्ज़त यंहा
भरी जेब को बांटी जाती है
अपमान, अन्याय और बुराई
सिर्फ़ गरीब के हिस्से आती है
वसुधैव कुटुम्बकम तो सिर्फ़ इतिहास की बातें है
चारो तरफ़ तो सिर्फ़ अलगाववादी ही नज़र आते हैं
खो गए वो सफ़ेद कबूतर कही
अब तो शिकारी भेडिये ही दिख जाते हैं
चोरों का पहनावा है खद्दर
या खद्दर पहन के चोर बन जाते हैं
ऐसी भी कैसी भूख है ये आजिम
छीन दूसरों का निवाला ये खाते हैं
कहते थे नेहरू अब आराम नही
क्या करे डिग्री है पर काम नही
इंतज़ार उम्मीद और अपेक्षाओं का ये दौर नही
दम घुटता है मेरा बस करो अब और नही
आओ कुछ तो इसका समाधान करें
क्यूँ न महाभारत सा एक घमासान करें
एक बार फ़िर से इस गुलशन को आजाद कराते हैं
फ़िर से सपनों का पाने एक हिन्दुस्तान बनाते हैं
Copyright 2009 © Raman Shukla "Azim" :)

1 comment:

A S said...

Nicely portraited views.. I agree with your views.

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...