Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Friday, August 28, 2009
ये दौलत भी ले लो ये शौहरत भी ले लो भले छीन लो मेरी जवानी मगर लौटा दो मुझको मेरा वो बचपन वो बारिश का पानी
क्या मस्त मौसम हो रखा है बाहर आज काफी दिनों बाद अहमदाबाद में बारिश हुई है और बस इस सुहाने मौसम के चलते बिना कोई नशा किए और गजल सुने हम nostalgic हो रहे हैं। इसी अवस्था के चलते हम कुछ पुरानी या यूँ कहे की बचपन की यादों में खो गए, साला क्या लाइफ हुआ करती थी कक्षा १ से लेकर १० तक same रूटीन सुबह उठना डाट खाते हुए स्कूल के लिए तैयार होना फ़िर वो शाही स्कूल वाहन डब्बे वाला रिक्शा पे चढ़ के स्कूल जाना वहाँ मुर्गा बने तो ठीक न बने तो बहुत अच्छा फ़िर अपने और दूसरों के टिफिन से लंच तक खा पीकर बराबर कर देना लंच को स्पोर्ट्स पीरियड की तरह इस्तेमाल करना फ़िर छुट्टी का इंतज़ार करना और वहस अपने शाही वाहन पे सवार हो के वापस आ जाना। शाम को होमवर्क निपटाना, रात का खाना खाना और सो जाना। अगर macroscopic लेवल पे देखा जाए तो यही दिनचर्या थी पर माइक्रोस्कोपिक लेवल पे देखा जाए तो सायद हम भी ३-४ पुराण तो अपनी लाइफ पे भी लिख सकते हैं :) तो actually में हम बात कर रहे थे nostalgic होने की और उसी अवस्था में बिज़ली की तरह एक प्रश्न हमारे मन में कौंधा की क्यूँ घर से इतनी दूर बैठे हैं? तुंरत अंतरात्मा ने जवाब दिया "अपने सपने पूरे करने के लिए " मन बड़ा ही हाजिरजवाब था उसने तुंरत पुछा की "ये सपने दिखाए किसने?" हम्म अबकी अंतरात्मा सोचने पे विवश हो गई की आख़िर इस सवाल का जवाब क्या है? इसे जानने के लिए फ़िर उसे मेरे बचपन में झांकना पड़ा तो याद आया वो बचपन में बड़ी गाड़ियों के पोस्टर्स जिन्हें देख के लगता था की कब ये हमारी होंगी , पापा से bike के लिए जिद्द करना तो उनका कहना बड़े होके अपनी कमाई से खरीदना अभी इससे साईकिल से काम चलाओ , किसी स्पेसिफिक डे पे मिन्नतें करके पापा की गाड़ी मांगना, पापा के स्कूटर पे बैठी गर्लफ्रेंड का किसी दूसरी की bike या कार देख के कंधे से हाथ हटा लेना !!! इन सबने दिखाए थे वो सपने जिन्हें पूरे करने के लिए आज हम उनसे दूर बैठे हिं जिनके लिए ये सपने देखे थे है न कमाल की बात। उससे भी कमल की बात है किजब हम बचपन में सोचते थे की जब पैसे आयेंगे तो ये करेंगे वो करेंगे इत्यादी और जब आज पैसे है तो उनमे से कुछ नही कर रहे न ढेर सारी चॉकलेट खरीद के खा पाते हैं और नही ढेर सारी कॉमिक्स खरीद के पढ़ पाते हैं / अच्छे तो वो बचपन के दिन जब न ये अंतरात्मा थी न पैसे थे थे तो सिर्फ़ मन के आकाश में कल्पना के बादलों से बनते और बिखरते सपने जो किसी भी पोस्टर , मूवी या न्यूज़ को देख के बदलते रहते थे। सायद इसीलिए जगजीत भाई कह गए हैं "ये दौलत भी ले लो ये शौहरत भी ले लो भले छीन लो मेरी जवानी मगर लौटा दो मुझको मेरा वो बचपन वो बारिश का पानी "
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वादा है की
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