वो मुझसे चाहता वही हैं
जो मेरे बस में नही है
दिन की तपिश है मुझमे
उसे सितारों का सुकून चाहिए
मै खुदा नही हूँ मोहतर्मा
इतना भी न आजमाईये
दूरी से इस ऐतराज़ नही
बस मुझे ये बेरुखी नही गँवारा
इस फासले को इतना न बढाईये
की सुनाई न दे जो मैंने पुकारा
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Wednesday, September 16, 2009
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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मेरे दिल में बसा कोई ख्वाब हँसा तो लगा की ये दिन ख़ास है मुस्कुरा के सुबह जो यूँ धरती पे आई जैसे सुहानी सी सौगात है जब जमीं पे पड़ी वो पानी ...
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सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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गुजर जाओ यहा से तो कभी लौट के भी आना है तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ यह बताने के लिए और तुम हो की डर से सिमाटते जा रहे हो खुद को मुझ...
1 comment:
Hmmmmmmm.... Kya khyal hain...
Par I dont think ki
dur rahne se duriyan badh jaati hai...
Pyar to aapke dil mein hona chahiye,
Ye berukhi bhi nazdiki mein badal jaati hai....
Wah wah... Hum bhi shayar ban gaye :)
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