ज़िन्दगी के रुख ने एक बार फ़िर मोड़ लिया
चलते चलते उछलकर हमने फ़िर एक पत्ता तोड़ लिया
एक बार फ़िर कुछ पाया और कुछ खो रहे हैं
कुछ को दीखते हम हँसते और कुछ्को दिखते रो रहे हैं
दिल की जिद्द ने गाड़ी फ़िर से एक नई पटरी पे उतार दी
एक बार और सुनसान सड़क पे हमने पत्थर को ठोकर मार दी
कही फ़िर से खड़े अकेले में दिल को हम समझा रहे हैं
की कोई नही फ़िर से एक बार ख़ुद को आजमा रहे हैं
ख़ुद को आजमा रहे हैं परखने को कि हम चुके नही हैं
जरा सा दम ले रहे हैं की हम अभी झुके नही हैं
गुरुर नही हमारा ये मौके की आजमाईश है
शायद अबकी छु ले असमान बस इतनी सी ख्वाहिश है
कुछ कर गुजरने को हो रहा अब मन ये बागी है
मजनू और फरहाद सी मोहब्बत मंजिल को लेके जागी है
कल को याद रखेगा कोई कह के "उसके मन में कुछ करने कि उमंग थी "
ये बेहतर है उससे कि कोई बोले " खँडहर बता रहे हैं ईमारत बुलंद थी "
कॉपीराइट रमन शुक्ला :)
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
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