Sunday, February 7, 2010

मराठी मानुष बाकि क्या आचार??

मै अपने विचारों में खोया हुआ सड़क के किनारे किनारे चला जा रहा था । शीत ऋतु उसी तरह ढलान पे थी जैसी कल की सफल अभिनेत्री तब्बू आजकल हैं और धूप दीपिका पदुकोने की तरह इठलाते हुए यत्र तत्र सर्वत्र अपने जलवे बिखेर रही थी और सभी लोगो ने अपनी अपनी उम्र के हिसाब से अपने अपने मंवंक्षित स्थान ग्रहण कर लिए थे इस धूर का प्रसाद ग्रहण करने के लिए जैसे की बूढ़े घर के बहर समूह में कुर्सियों पे बैठे हुए थे महिलाएं अपने अपने घरों की छत पे विराजमान थी बचे गलियों में दौड़ लगते हुए नाना प्रकार के खेल खेल रहे थे। तभी अचानक से एक उड़नखटोला प्रकट हुआ और उसमे से एक आदमी ने मुझे बलपूर्वक अपने साथ बैठा लिया उसके रंग रूप और वेश भूषा को को देख के लगा की इस विचित्र प्राणी का नाम नारद हो सकता है । खैर जैसा की पुराणों , रामायण और महाभारत में लिखा हुआ है हम ठुन्न की आवाज के साथ एक अजीब सी नयी जगह पहुच गए ... दिमाग पे बहुत जोर डालने के बाद भी वो जगह कदापि भी पहचानी हुई नहीं लगी , विदेश जैसा कुछ नहीं था और खैर भारत जैसा तो बिलकुल भी कुछ नहीं था , "प्रभु हम धरती से एक मानव को ले आये हैं ", नारद के इस स्वर ने हमारे अवलोकन को भंग किया और तब हमने देखा सामने प्रभु गणपति विराजमान हैं , उन्होंने बिना अपना हथिनुमा सर उठाये कहा की अभी पल भर ठहरो पहले इस "गणेश छाप तम्बाकू " वाले से निपट लेने दो, नारद ने बिना किसी विलम्ब के कहा महाराज आप लगता है की भूल गए हम इस मानव को "मराठी " समस्या के समाधान के लिए लाये हैं । इतना सुनने की देर थी की प्रभु ने तुरंत इस नज़र से देखा हो जैसे की हमारे नाम पे ५०००००००००० स्वर्ण मुद्राओं का पुरस्कार घोषित था और अब हमें पकड़ लिया गया है , खैर हमारा शिख से नख तक अवलोकन करने के बाद बोले की इसका अकाउंट ले आओ तो हम तुरंत बीच में बोल पड़े की गुरुवार अकाउंट खली है और क्रेडिट कार्ड हमारे २ साल से बंद पड़े हैं तुरंत जवाब आया "मुर्ख हम जीवन के बहीखाते की बात कर रहे हैं " चलो सांस में सांस आई नहीं तो भरे स्वर्ग में बेईज्ज़ती हो जाती । फिर गणपति बोले की डरो मत हमने एक सुर्वे के लिए तुम्हे क्रमरहित चुनाव के जरिये लाया गया है और हम तुम्हे कुछ समस्याएं बताना चाहते है और कहते हैं की तुम उन समस्याओं को लेके राज ठाकरे से हमारे लिए बातचीत करो । अब हम ठहरे टेक्नीकल आदमी तुरंत सुझाव दिए की भगवन हमें इस पचड़े में मत डालो पहले ये बताओ की स्वर्गलोक में ब्रॉडबैंड है की नहीं?? तो उन्होंने बताया की हाँ अभी अभी लगवाया है एयरटेल का है मैंने कहा बस तो फिर समझो काम हो गया हम आपकी यही से जी-टॉक पे आपकी ठाकरे साहब से सीहे बात करा देते हैं क्यूंकि जिनसे बच्चन साहब और शारुख खान नहीं बात कर पे तो मै अदना सा प्राणी क्या ही जा पाउँगा । भगवन ने तुरंत हमारी पीड़ा को समझा और हमारे बताये हुए साधन से चैट करना शुरू कर दिया प्रस्तुत है चैट का हाथों टाइप किया हुआ हाल:
गणपति: भो बालक क्या चल रहा है ??
र ठाकरे: अरे कौन नोर्थ इंडियन हमें पिंग कर रहा है ये भो**** वही के लोग ज्यादा कहते हैं
गणपति: अरे मुर्ख मै वो हूँ जो हर साल तुम्हे सँभालने आता हूँ और तुम मुझे बार बार सागर में वापस फेक देते हो , मैंने वो गाना भी सुना है "तुम्हे दर्शन देने आना ही होगा " और जब मै आता हूँ तो तुम लोग मुझे वापस समुन्दर में फेक देते हो , आजकल तुमने वह पर जो छीछालेदर फैला राखी है उसे समाप्त करने का जिम्मा हमें दिया गया है ।
र ठाकरे: अरे गणपति !! तू कसा आला?
गणपति: कृपया रास्त्रभाषा हिंदी का प्रयोग करे हमें ये चैट रिपोर्ट भगवन शंकर को देनी है उन्हें संस्कृत और हिंदी के अलावा सिर्फ लातों की ही भाषा आती है
र ठाकरे: मे काय केला पईझे मतलब की ई क्या कर सकत हूँ इस मुद्दे के अलवा हमने पिछले कुछ सालों मे कुछ किया ही नहीं है तो वोट कहा से मिलेंगे चुनाव मे।
(इतनसुनते ही गणपति क्रोधित हो गए सोचे की मराठी "मानुष" बाकि क्या आचार?? मैंने भी गणपति को बतया की अभी इन्होने अपने यंहा रहने वाले गैर मराठी लोगों को मर-मर के भाग्या है और जब यही काम ऑस्ट्रेलिया वालों ने किया तो इन्होने उस देश के क्रिकेट खिलाडियों के महारास्ट्र मे न खेलने देने की धमकी दे डाली तो इस हिसाब से तो हमें सचिन तेंदुलकर को टीम से निकल देना चाहिए... इतना काफी था गणेश जी को उकसाने के लिए इसके बाद की बात आप ही देख लीजिये )
गणपति: **&&^%^%$$$@@##@#@#@#@##@ तुम्हारी तो @#$#!$^%^@)*&
र ठाकरे: अरे मै क्या॥ मुझे क्यूँ ..........
गणपति; $#$#$#$#&#&#&*#&#&&#^^#%#^#%$^$#^%%^!&!&!&!^)^
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गणपति: अब और कुच्नाही कहूँगा देख लो २०१० मे सुधर जा वरना कुंडली तो तुम्हारी भी मेरे हाथ मे ही है वैसे भी मुझे डुबो डुबो के समंदर ख़राब खरने से मेरा दिमाग ख़राब है और अगर अब तुम्हारी वजह से सचिन को टीम से निकला ये बच्चन साहब की फिल्मे आना बंद हुई तो तुम्हारी खैर नहीं....

इतने मै संभला तो देखा सामने एक बाइक वाला मुझे पे चिल्ल रहा था की "देख के चल वरना तेरी खैर नहीं " मैंने अपने विचारों और क़दमों को सँभालते हुए अंगडाई ली और मंद मंद मुस्कुराते हुए ये सोच के आगे बढ़ गया की "मराठी मानुष बाकि क्या आचार??"

2 comments:

Unknown said...

sala kuchh log hote hai jo agar tatti bhi kar den to padhane ka man karata hai....aur agar wahi log achha likhane lage to samajh me nahi ata ki AAB tareef kaise ki jaye......koi nahi agale post tak seekhane ki kosis hogi...

Raman Shukla said...

thanks bhai for hausla afjayi

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...