सोचता हूँ कभी जब अकेले खड़े हो कर
जब रौशनी खो गयो गयी होती है
ये दुनिया सो गयी होती है
की क्या कर दूँ मै
अगर पानी रूठ जाये नदी से
आँख न मिला पाए कोई खुद ही से
पंछी अगर बसेरा छोड़ दे
सूरज करना अगर सवेरा छोड़ दे
क्यूँ न बन भागीरथ गंगा बहा दूँ
क्यूँ न भटके को पश्चताप की राह दिखा दूँ
पंछी को पवन से लौटने का सन्देश पंहुचा दूँ
दूर करने को अँधेरा छोटा सा दिया जला दूँ
क्या बदल दूँ दोस्त अगर दोस्त बदल जाये तो
क्या खीच लूँ आँचल लज्जा मूरत कोई शर्माए जो
क्या बदल दूँ रस्ते जो सामने मझधार हो
उजाड़ दूँ मिले अगर कही बहार तो
या करूँ वही जो दोस्त को स्वीकार हो
देख कर मूरत निकल जाऊं अदब से न कोई शर्मशार हो
मझधार को खे कर एक रास्ता नया बना दूँ
मिले कही बहार तो एक और गुलशन सजा दूँ
हर दुसरे विकल्प में वक़्त थोडा लग जायेगा
पर एक खूबसूरत कल बन जरूर जायेगा
इतना ज्ञान तो आज इस छोटे ह्रदय में भर दूँ
क्या कोई और बताएगा की मै और क्या कर दूँ ????
कॉपीराइट रमन शुक्ला :)
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Monday, March 15, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
-
मेरे दिल में बसा कोई ख्वाब हँसा तो लगा की ये दिन ख़ास है मुस्कुरा के सुबह जो यूँ धरती पे आई जैसे सुहानी सी सौगात है जब जमीं पे पड़ी वो पानी ...
-
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
-
गुजर जाओ यहा से तो कभी लौट के भी आना है तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ यह बताने के लिए और तुम हो की डर से सिमाटते जा रहे हो खुद को मुझ...
2 comments:
itna kar dijiye uske bad aage sochiyega :D
achhi hai
mast bhai...........ya koi aur batae kya ker du....solid...
Post a Comment