Monday, March 15, 2010

क्या कर दूँ

सोचता हूँ कभी जब अकेले खड़े हो कर
जब रौशनी खो गयो गयी होती है
ये दुनिया सो गयी होती है
की क्या कर दूँ मै
अगर पानी रूठ जाये नदी से
आँख न मिला पाए कोई खुद ही से
पंछी अगर बसेरा छोड़ दे
सूरज करना अगर सवेरा छोड़ दे
क्यूँ न बन भागीरथ गंगा बहा दूँ
क्यूँ न भटके को पश्चताप की राह दिखा दूँ
पंछी को पवन से लौटने का सन्देश पंहुचा दूँ
दूर करने को अँधेरा छोटा सा दिया जला दूँ

क्या बदल दूँ दोस्त अगर दोस्त बदल जाये तो
क्या खीच लूँ आँचल लज्जा मूरत कोई शर्माए जो
क्या बदल दूँ रस्ते जो सामने मझधार हो
उजाड़ दूँ मिले अगर कही बहार तो
या करूँ वही जो दोस्त को स्वीकार हो
देख कर मूरत निकल जाऊं अदब से न कोई शर्मशार हो
मझधार को खे कर एक रास्ता नया बना दूँ
मिले कही बहार तो एक और गुलशन सजा दूँ

हर दुसरे विकल्प में वक़्त थोडा लग जायेगा
पर एक खूबसूरत कल बन जरूर जायेगा
इतना ज्ञान तो आज इस छोटे ह्रदय में भर दूँ
क्या कोई और बताएगा की मै और क्या कर दूँ ????


कॉपीराइट रमन शुक्ला :)

2 comments:

luckygopika said...

itna kar dijiye uske bad aage sochiyega :D
achhi hai

Gaurav said...

mast bhai...........ya koi aur batae kya ker du....solid...

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...