Sunday, September 5, 2010

रुसवा

बहुत कुछ तुम समझते हो
या समझते कुछ नहीं तुम हो
यहाँ पर अश्क बहते है
अगर कही तुम जो गुमसुम हो
अगर तुम्हारा दिल शीशे सा है बिखरा
तो हमरा भी रेत का महल टूटा है
फेर कर मुह कभी भी तुम चले जाओ
पर मत बोलो की वो सनम था जो झूठा है

की शायद आज इन बातों पे यकीं तुमको न हो
पर कभी तो सच खुल कर आएगा
दोनों ही शायद तब अफ़सोस से रोयेंगे
पर सच किसी से कहा न जायेगा .......

कॉपीराइट रमन शुक्ला :)

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