बहुत कुछ तुम समझते हो
या समझते कुछ नहीं तुम हो
यहाँ पर अश्क बहते है
अगर कही तुम जो गुमसुम हो
अगर तुम्हारा दिल शीशे सा है बिखरा
तो हमरा भी रेत का महल टूटा है
फेर कर मुह कभी भी तुम चले जाओ
पर मत बोलो की वो सनम था जो झूठा है
की शायद आज इन बातों पे यकीं तुमको न हो
पर कभी तो सच खुल कर आएगा
दोनों ही शायद तब अफ़सोस से रोयेंगे
पर सच किसी से कहा न जायेगा .......
कॉपीराइट रमन शुक्ला :)
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Sunday, September 5, 2010
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वादा है की
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