तनहा ठहरा हूँ सहरा में वरना अभी डूब जाने को गम बहुत हैं
मिला था जो दिल वो तोड़ आया हूँ , वरना दिल चुराने को सनम बहुत हैं
वैसे तो लरजते लफ़्ज़ों से शायरी कर रहा होता अभी तो बताने को गम बहुत हैं
मुफलिसी में उनको याद करता हूँ वरना करने को इस दुनिया में करम बहुत हैं
कॉपीराइट रमन शुक्ला :)
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Sunday, September 12, 2010
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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मेरे दिल में बसा कोई ख्वाब हँसा तो लगा की ये दिन ख़ास है मुस्कुरा के सुबह जो यूँ धरती पे आई जैसे सुहानी सी सौगात है जब जमीं पे पड़ी वो पानी ...
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सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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गुजर जाओ यहा से तो कभी लौट के भी आना है तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ यह बताने के लिए और तुम हो की डर से सिमाटते जा रहे हो खुद को मुझ...
1 comment:
Wah wah wah :)
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