जिसको आदत थी मेरे कंधे की
कैसे उसने दूसरे के कंधे पे संभाला सर होगा
मेरे दिल सोच के कश्मशाता है
नया आया जो होगा उनके दिल में
देखा उसने वहां मेरा पुराना घर होगा
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Thursday, December 9, 2010
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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मेरे दिल में बसा कोई ख्वाब हँसा तो लगा की ये दिन ख़ास है मुस्कुरा के सुबह जो यूँ धरती पे आई जैसे सुहानी सी सौगात है जब जमीं पे पड़ी वो पानी ...
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सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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गुजर जाओ यहा से तो कभी लौट के भी आना है तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ यह बताने के लिए और तुम हो की डर से सिमाटते जा रहे हो खुद को मुझ...
1 comment:
tere kandha ya mera kandha ?? :)))))
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